दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा का अपने संगठन, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और संसाधनों पर अत्याधिक भरोसा, राष्ट्रीय स्वये सेवक संघ की हिंदुत्व ब्रिग्रेड की बयानबाजी, दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव, चर्चों पर हमले, मोदी सरकार की उद्योग और बाजार परस्त आर्थिक नीतियों, स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी, केंद्रीय नेतृत्व की मनमानी और समर्पित कार्यकर्ताओं के सिर पर अचानक आयातित मुख्यमंत्री उम्मीदवार को थोपे जाने की भारी कीमत चुकानी पड़ी दिल्ली में लगभग पार्टी का सफाया हो गया।
वहीं अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को अपनी गलतियों से सीखने, जनता से सीधे जुडऩे, उसके मुद्दों को उठाने और अल्पसंख्यकों, गरीबों के साथ साथ हर वर्ग उम्र के लोगों का भरोसा जीतने का शानदार पुरस्कार जीत के रूप में मिला।
आप का जनसमर्थन आया काम
लोकसभा चुनावों के बाद अरविंद केजरीवाल जब नरेंद्र मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव हार कर लौटे तो वह खुद और उनकी पूरी पार्टी मायूस थी। वहीं भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साह आसमान छू रहा था। आप के नेताओं ने दिल्ली में फिर सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के नेताओं से संपर्क साधना शुरु किया। लेकिन बात नहीं बनी।
उधर भाजपा विधानसभा चुनाव तुरंत कराने की जगह जोड़ तोड़ करके अपनी सरकार बनाने में जुट गई। भाजपा की इन कोशिशों ने केजरीवाल और उनकी टीम में जान फूंक दी। अपने विधायकों को टूटने से बचाने के लिए आम आदमी पार्टी ने जबर्दस्त प्रचार अभियान चलाया जिसने दिल्ली की सियासत में उसे फिर प्रासंगिक बना दिया।
इसके बाद आप के युवा कार्यकर्ता दिल्ली के मोहल्लों, गावों, गलियों, कालोनियों, बस्तियों में घर घर जाकर जनसंपर्क में जुट गए। जबकि कांग्रेस इस खुशफहमी में रही कि आप खत्म हो गई है और भाजपा के खिलाफ उसकी सीधी लड़ाई होगी और वह पहले से बेहतर तो करेगी ही। वहीं भाजपा को अपने नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर इस कदर भरोसा था कि मोदी की रैलियों से दिल्ली का माहौल भाजपा केपक्ष में एकतरफा हो जाएगा।
बयानबाजी पड़ी भारी
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने मनमानी करते हुए न सिर्फ दिल्ली के पुराने नेताओं को अनदेखा किया, बल्कि पिछले चुनाव में भाजपा का चेहरा रहे साफ सुथरी छवि वाले हर्षवर्धन को हाशिए पर भी डाल दिया।
पहले पूरे चुनाव को मोदी की छवि और नाम पर जीतने की रणनीति बनाई गई फिर अचानक गैर राजनीतिक किरण बेदी को पार्टी में शामिल करके उन्हें स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के सिर पर बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार थोप दिया गया। इसका ऊपर से नीचे तक संगठन में बहुत खराब संदेश गया।
पूरे चुनाव को रैली थैली की पुरानी राजनीति से जीतने की कोशिश भी भारी पड़ी। पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके दलबदलुओं को बड़ी संख्या में टिकट दिए गए। योगी आदित्यनाथ, स्वामी साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति जैसे भाजपा के हिंदुत्ववादी नेताओं और विहिप नेताओं की बयानबाजी, घर वापसी जैसे आयोजनों ने मोदी सरकार और भाजपा के विकास एजेंडे को धुंधला कर दिया। रही सही कसर दिल्ली में त्रिलोकपुरी केदंगे और बवाना व ओखला में सांप्रदायिक तनाव और चर्चों पर हमलों ने पूरी कर दी।
महंगा सूट पड़ा भारी
दिल्ली के अमन पसंद शहरी इससे खफा हो गए। मोदी सरकार की घोषणाओं और चुनावी वादों के अमल में हो रही देरी, आर्थिक सुधारों के नाम पर लिए गए कुछ फैसलों ने सरकार की छवि को धक्का पहुंचाया।
रही सही कसर प्रधानमंत्री के महंगे सूट ने पूरी कर दी। इससे जनता में अच्छा संदेश नहीं गया। उधर कांग्रेस के मैदान में बेमन से उतरने और आम आदमी पार्टी की सक्रियता ने मुस्लिमों को पूरी तरह आप की तरफ मोड़ दिया।
मोदी के खिलाफ चुनाव लड़कर केजरीवाल अपनी आक्रामकता पहले ही साबित कर चुके थे। आटो वालों, झुग्गी बस्ती वालों, रिक्शा वालों, रेहड़ी पटरी वालों को केजरीवाल सरकार के 49 दिनों के दौरान पुलिस और रिश्वतखोरी से मिली राहत ने उन्हें आप केसाथ और मजबूती से जोड़ दिया।
अरविंद केजरीवाल पर हमला पड़ा भारी
जबकि वह मध्य वर्ग जो पिछली सरकार में केजरीवाल के धरना प्रदर्शनों और अचानक इस्तीफा देने से छिटक गया था, उसे भी बिजली की आधी दरें, मुफ्त पानी, वाई फाई, महिला सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे जैसे नारे भा गए।
वहीं भाजपा अपना चुनावी घोषणा पत्र तक जारी नहीं कर सकी। रही सही कसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली रैली से ही अरविंद केजरीवाल पर सीधा हमला बोलकर पूरी कर दी।
उन्हें नक्सिलयों के साथ जंगल में जाकर रहने की नसीहत, फिर अखबारों में केजरीवाल को लेकर नकारात्कम विज्ञापनों और उनके उपद्रवी गोत्र की शब्दावली ने आप के लिए सहानुभूति पैदा की जो लहर में बदल गई।
भाजपा की आत्ममुग्धता, कांग्रेस की कमजोरी और अपने कार्यकर्ताओं की मेहनत आम आदमी पार्टी की ऐसी ताकत बन गई जो चुनाव नतीजों में सुनामी बनकर सामने आई।