1993 मुंबई ब्लास्ट के आरोपी याकूब मेमन की फांसी की तारीख 30 जुलाई तय होने के बाद से ही हंगामा बरपा हुआ है। सपा नेता अबु आजमी ने जहां खुल कर फांसी का विरोध किया वहीं दूसरी ओर भाजपा समेत अन्य दलों ने विशेष कोर्ट के फैसले का स्वागत किया।
बीती 21 जुलाई को मेमन की आखिरी उम्मीद भी उस वक्त टूट गई जब सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा बरकरार रखते हुए क्यूरेटिव पिटीशन को खारिज कर दिया। जिसके बाद महाराष्ट्र की नागपुर जेल में फांसी की तैयारियां शुरु कर दी गई।
मेमन ने अपनी फांसी रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में फिर से गुहार लगाई है और आज ही न्यूज वेबसाइट रेडिफ डॉट कॉम ने 2007 में कैबिनेट सचिवालय में अतिरिक्त सचिव रहे बी.रमन का एक लेख छापा है।
'न हो फांसी'
रमन की राय है कि मेमन को फांसी नहीं होनी चाहिए। रमन के रिटारयरमेंट से कुछ महीने पहले जुलाई 1994 में याकूब मेमन को नेपाल पुलिस की सहायता से कांठमांडू में गिफ्तार किया गया था।
काठमांडू से गिरफ्तार करने के बाद उसे भारतीय सीमा में लाया गया, और फिर उड्डयन शोध केन्द्र के विमान से दिल्ली लाया गया। अफसरों ने खाना पूर्ति करने के लिए उसकी गिरफ्तारी पुरानी दिल्ली में दिखाई, जिसके बाद उसे पूछताछ करने के लिए हिरासत में लिया गया।
इस पूरे अभियान का कोआर्डिनेशन बी.रमन के हाथों में ही था। कॉलम में लिखा गया है कि याकूब ने जांच एजेंसियों का सहयोग किया है। उसने अपने परिवार को पाकिस्तान से लाने का प्रयास किया, और उसके आत्मसमर्पण जैसे मामलों को देखते हुए फांसी की सजा पर सवाल पर उठाने लायक है।
बड़े भाई के इजाजत से छापा लेख
रमन ने जब यह कॉलम लिखा था, तो उन्होंने अनुरोध किया था कि यह प्रकाशन के लिए न भेजा जाए। बी. रमन रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पाकिस्तनी डेस्क के मुखिया थे।
याकूब और उसकी फैमिली के सदस्यों को कराची से भारत तक लाने में पूरा ऑपरेशन उनकी देख रेख में हुआ। रेडिफ डॉट कॉम के मुताबिक यह लेख रम के बड़े भाई और रिटार्यर्ड आईएएस बी.एस रमन री इजाजत से छापा है।
2013 के जून में रमन की मृत्यु हो गई थी। रमन ने अपने लेख में आगे लिखा है कि 'मैं हमेशा अपने आप से पूछता रहा हूं कि क्या मुझे यह लेख लिखना चाहिए'?
मेरे मन में उठे कई सवाल
उन्होंने लिखा है कि अगर मैं ऐसा नहीं करुंगा तो नैतिक आधार पर कायर कहा जाऊंगा और अलग मैंने यह लेख लिख दिया तो क्या यह सारा मामला सुलझा जाएगा? रमन लिखते हैं बावजूद दोषी होने के के क्या वह (मेमन) सजा से बच जाएगा?
क्या न्यायालय मेरे लेख में निहित विचारों को अर्थ में लेगा? क्या ये अदालत की तौहीन है? उन्होंने लिखा है इन सारे सवालो के जवाब पाना असंभव था।
मैंने यह लेख इस भरोसे लिखना शुरु किया कि एक उस शख्स को फांसी के फंदे से बचाने की कोशिश होनी चाहिए, जो इस सजा के लायक नहीं है। (फोटो रेडिफ डॉट कॉम से साभार)
याकूब ने किया सहयोग
रेडिफ पर प्रकाशित इस लेख में रमन ने लिखा है कि 'मैं यह जानकार परेशान था कि अभियोग पक्ष ने मेमन और उसके परिवारीजनों को कराची से लाए जाने के अभियान से संबंधित हालात के बारे में न्यायालय को सूचित नहीं किया।
रमन ने लेख में लिखा है कि इस बात में कोई शंका नहीं है कि मेमन धमाकों की साजिश में शामिल था। मेमन ने अपनी गिरफ्तारी (जुलाई 1994) से पहले जो कार्य किया उसके लिए उसे फांसी की सजा मिलनी चाहिए, लेकिन नेपाल में गिरफ्तारी के बाद के हालातों पर अगर गौर किया जाए तो फांसी की सजा पर सोचने की जरुरत है।
रमन ने लेख में लिखा है कि याकूब ने जांच एजेंसियों को सहयोग दिया है और अपने परिवारीजनों को वापस भारत लाने के लिए भी तैयार किया। इसके बाद याकूब के कहने पर उसके घर वालों ने भारतीय अधिकारियों के समक्ष समर्पण कर दिया।