अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी और वित्त मंत्री पेनी प्रिट्जकर के बाद रक्षा मंत्री चक हेगल की भारत यात्रा मोदी सरकार को लुभाने और पिछले कुछ सालों से ठंडे पडे द्विपक्षीय रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने का ठोस प्रयास थी।
अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री अरुण जेटली और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात की और कई सार्वजनिक बैठकें की। इस दौरान उन्होंने अगले महीने नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा से पहले भारत को लुभाने में कोई कसर नहीं छोडी।
रक्षा सहयोग
भारत अपनी सेनाओं को उन्नत करने की इच्छा रखता है, जिसके तहत वह रक्षा प्रणाली और तकनीक की न सिर्फ खरीदारी करेगा बल्कि विदेशी सहयोग से इन्हें घरेलू स्तर पर ही विकसित भी केरगा।
इसे समझते हुए चक हेगल ने मेग्नेटिक कैटापुल्ट, जेवलिन मिसाइल, हॉक-21 मिसाइल समेत सात नई रक्षा प्रणालियां भारत को देने की पेशकश की।
भारत की घरेलू स्तर पर रक्षा उपकरणों के उत्पादन को बढावा देने की इच्छा के मुताबिक हेगल ने कहा कि अमेरिकी रक्षा प्रणालियों के सह-उत्पादन और सह-विकास के लिए ‘पॉयलट प्लान’ ला रहा है।
उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अगले महीने अमेरिका में होने वाली बातचीत के लिए भी माहौल बनाने की कोशिश की।
चीन का सवाल
हेगल ने भारत की स्थिति को भी समझा कि अमेरिका के साथ रिश्तों में सुधार चीन के साथ बढ रही नजदीकियों की कीमत पर नहीं हो सकता।
हालांकि उन्होंने अमेरिका, भारत और जापान के बीत तीन स्तरीय सहयोग बढाने की बात जरूर कही पर उन्होंने यह भी साफ किया कि इसका मतलब चीन का विरोध नहीं है।
एशिया में भारत
हेगल ने यह भी कहा कि अमेरिका क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को स्वीकार करता है। यह कहकर उनका मकसद भारत को शांत करना ही था क्योंकि 2011 में खुद ही कह चुके थे कि, “भारत ने हमेशा अफगानिस्तान का दूसरे मोर्चे की तरह इस्तेमाल किया है और सीमा के उस पार से पाकिस्तान में समस्याओं को प्रायोजित करता रहा है।”
हेगल ने कहा कि अमेरिका न सिर्फ अफगानिस्तान बल्कि एशिया में और वैश्विक स्तर पर सुरक्षा ढांचे में भारत की बडी भूमिका देखता है। यह सुनना बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को जरूर अच्छा लगा होगा।
हाल के दिनों में भारत आए अमेरिकी अधिकारियों के बयान और अमरीका के इरादे जाहिर करते हैं कि ओबामा प्रशासन खासकर नरेंद्र मोदी और सामान्य तौर पर भारत सरकार को लेकर पुरानी कडवाहट भूलने के लिए प्रतिबद्ध है।
अमेरिका को अपने उद्योगों के लिए ऑर्डर पाने और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की जरूरत है और अमेरिका अब इसमें भारत की बडी भूमिका देखता है।