रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सी. उदय भास्कर ने कहा, 'मुझे यह कहते हुए बड़ा अफसोस हो रहा है कि पाकिस्तान में आज जो कुछ हुआ या हो रहा है, कहीं भारत में भी वही भविष्य में न होने लगे। दरअसल, जब-जब किसी भी देश में धार्मिक उन्माद को राजनीति से जोड़कर देखा जाने लगता है और आम जनता को उसी भावना में डुबोकर लोकतंत्र का राग अलापा जाता है, तब-तब अनजाने में ऐसी सिरफिरी ताकतों के लिए हम एक प्लेटफार्म तैयार कर रहे होते हैं, जो कालांतर में तालिबान बनकर हमारी ही संतानों पर भारी पड़ती हैं।'
एक स्कूल के इतने सारे बच्चों को मौत के घाट उतार देना केवल पाकिस्तान के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए शर्म की बात है। मैं तो कहूंगा कि आज पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि भारत में भी आज वही माहौल बन रहा है, जिसके चलते पाकिस्तान में तहरीक-ए- तालिबान या हक्कानी नेटवर्क या लश्कर-ए-ताइबा का जन्म हुआ।
हिंदुस्तान में लव जिहाद, धर्मांतरण या बंगलूरू में आईएस के लिए ट्वीट करने वाले युवा का पकड़ा जाना कोई बहुत अच्छी बात नहीं है, बल्कि हमें पाकिस्तान में हुई आज की घटना से नसीहत लेने की जरूरत है कि हम भी कहीं उसी माहौल की तरफ तो आगे नहीं बढ़ रहे ?
वैसे भी पाकिस्तान की अगर बात करें तो इमरान खान की पार्टी ने भी चुनावों में इसी कट्टरपंथ का सहारा लिया था, हमीद गुल और ताहिर उल कादरी भी उसी लाइन पर आगे बढ़ते रहे, लेकिन इन्होंने जो रास्ता अख्तियार किया वही आज वहां तबाही ढा रहा है। यह धार्मिक उन्माद जनता के बीच एक लहर पैदा करता है और यह लहर इंडो-पाक बॉर्डर नहीं पहचानती। यह कभी भी किसी भी मुल्क पर हमलावर हो सकती है चाहे खुद अपना ही देश क्यों न हो।
ओसामा बिन लादेन को जब मारा गया तब लोग मुझसे कहते थे कि अब वहां कोई ओसामा पैदा नहीं होगा, लेकिन सच्चाई यह है कि आज पाक में कई ओसामा हैं, जो उसी को तबाह कर रहे हैं। इसी तरह मैं यह नहीं मानता कि स्कूली बच्चों को तालिबानियों ने पहली बार अपना शिकार बनाया है।
स्कूल जा रही मलाला को मारने की कोशिश के अलावा तालिबान स्वात, वजीरिस्तान और नार्थ-वेस्ट के दर्जनों स्कूलों को बर्बाद कर चुका है। अलबत्ता, इतनी बड़ी संख्या में पहली बार बच्चे मारे गए हैं। मैं तो बस यही कहूंगा कि जो भी हो भारत को सतर्क रहने की जरूरत है और यह समझने की भी जरूरत है कि राजनीति को धर्म से जोड़कर देखा जाना बंद होना चाहिए।
इस्लाम के दुश्मन हैं बच्चों के कातिल: कैलाश सत्यार्थी
आज मेरा दिल रो रहा है। यह मानवता के सबसे काले दिनों में से एक है। आतंकियों ने हमारे अपने बच्चों को निशाना बनाया है। इस कायराना करतूत को अंजाम देने वालों का न तो इंसानियत में यकीन है और न इस्लाम में। जिन बच्चों का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया, उनके माता-पिता के लिए मैं दुआ करता हूं। खुदा उन्हें इस गम का सामना करने की ताकत दे।
स्कूल पर आतंकवादियों के कब्जे से मेरी रूह कांप उठी थी। मैं किसी खौफनाक मंजर की आशंका से बुत बन गया था। पल भर को मैं सन्नाटे में आ गया था। मैंने आतंकवादियों से अपील की थी कि बच्चों के बदले उनके सामने मैं हाजिर हो जाऊंगा। मेरे साथ उन्हें जो करना हैं करें लेकिन स्कूल में फंसे मेरे 400 बच्चों को आजाद कर दें।
तालिबान के जिन आतंकवादियों ने बच्चों का खून किया वे अल्लाह के दुश्मन हैं। वे मजहब और इस्लाम के दुश्मन हैं। वे हम सबके दुश्मन हैं। मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि उन्हें कहीं से कोई अक्ल मिले।
मेरा दिल बेरहमी से मौत की नींद सुला दिए गए बच्चों के मां-बाप के लिए रो रहा है। जो बच्चे मारे गए वे मेरे अपने थे। गम की इस घड़ी में मेरी दुआ और जज्बात उनके साथ हैं। मैं तहेदिल से उन्हें सुकून पहुंचाने के लिए दुआ कर रहा हूं।
मैं पाकिस्तान की सरकार और पूरी दुनिया से अपील करता हूं कि बच्चों के इन दुश्मनों के खिलाफ कड़े कदम उठाएं। ये मुल्क के नहीं पूरी इंसानियत के लिए खतरा हैं। ऐसी वहशियाना हरकतों को कुचलने के लिए हर चंद कदम उठाए जाएं। पाकिस्तान की सरकार स्कूलों और बच्चों को दहशतगर्दी से बचाने के लिए पुख्ता इंतजाम करे। आज जहां भी हिंसा और लड़ाई चल रही है, सबसे पहले बच्चे उसके शिकार बन रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि हम सब इस खून-खराबे को रोकने के लिए उठ खड़े हों।
(बच्चों की बेहतरी के लिए काम करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी को जैसी ही खबर मिली कि आतंकवादियों ने पेशावर के एक स्कूल में घुस कर बच्चों को बंधक बना लिया है वैसे ही उन्होंने अपनी ओर से उन्हें छोड़ने के लिए अपील जारी कर दी। कैलाश उन बच्चों के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थे। एक के बाद एक ट्वीट कर वह बच्चों को छोड़ने की अपील करते रहे। )
सदमे में है पूरा पाकिस्तान: असमा जहांगीर
आतंकी हमले में मासूम बच्चों की मौत से पूरा पाकिस्तान सदमे में हैं। आतंकियों की इस घिनौनी हरकत ने साबित कर दिया है कि वे अपने मकसद को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसा पहली बार नहीं है कि आतंकियों ने किसी स्कूल को निशाना बनाया हो पहले भी कई बार इस तरह के हमले किए जा चुके हैं। लेकिन पेशावर के स्कूल में किया गया हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला है।
सेना इस बाबत पहले भी स्कूलों से अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए कह चुकी है। आतंकी कहते हैं कि वे सेना की कार्रवाई का बदला ले रहे हैं। मैं पूछना चाहती हूं आखिर किस बात का बदला, हमला तो उन्होंने हमारे मुल्क पर किया है।
सेना तो सिर्फ अवाम की हिफाजत के लिए अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। अफसोस की बात यह है कि पाकिस्तान में जब बच्चे महफूज नहीं तो फिर दूसरों की हिफाजत की क्या बात की जाए। मेरा मानना है कि सरकार और सेना को आतंकियों के खिलाफ और सख्त रुख अपनाना होगा और ऐसे लोगों पर नरमी बरतने की कोई गुंजाइश नहीं है।
सेना का मनोबल गिराने की कोशिश: रहीमुल्ला यूसुफजई (पत्रकार)
पाकिस्तानी तालिबान के हमले का मकसद सेना को नुकसान पहुंचाना था। सेना और उससे जुड़े संस्थानों को तालिबान पहले भी निशाना बनाते रहे हैं। लेकिन अब ऐसा करना उनके लिए मुश्किल हो रहा है तो उन्होंने सेना से जुड़े स्कूल पर हमला कर मासूमों को निशाना बनाया। मेरा मानना है कि यह हमला पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति से जुड़ा है और फिलहाल इसका अंतरराष्ट्रीयकरण करना ठीक नहीं।
तालिबान बदले की आड़ में सेना का मनोबल भी गिराना चाहता है। तालिबानी हमेशा इस तरह के हमले के बाद बदला लेने की दलील पेश करते हैं। लेकिन उनकी इस दलील को कोई भी मानने को तैयार नहीं है। 100 से ज्यादा बच्चों को मौत के घाट उतार देने की घटना को किसी भी दलील से सही नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे हमले करके तालिबान को कुछ हासिल नहीं होगा। जहां तक आम लोगों की बात है तो वह भी तालिबान की हिमायत नहीं करते।
इस हमले ने साबित कर दिया है कि तालिबान को भी अब जनता की राय की परवाह नहीं है। तालिबान पहले स्कूलों पर हमला कर उन्हें तबाह करते थे लेकिन यह पहली बार है जब स्कूल में घुसकर मासूम बच्चों को निशाना बनाया गया है। यह हमला स्कूलों की सुरक्षा पर भी सवाल उठाता है। मेरा मानना है कि आने वाले वक्त में सेना और मजबूती से पाकिस्तानी तालिबान के खिलाफ कार्रवाई करेगी।
लगा जैसे कयामत बरपा हो गई: नादिया नकी (न्यूज एंकर, पाकिस्तान)
पाकिस्तान में आतंकी हमला कोई नई बात नहीं लेकिन जिस तरह से इस बार बेरहमी से बच्चों को निशाना बनाया गया वैसा आज तक नहीं हुआ। ऐसा लगा मानो कयामत आ गई हो।
इस हमले का मकसद तो साफ है और वह यह कि पाकिस्तानी तालिबान सेना से बदला लेना चाहते थे। इसकी सबसे बड़ी वजह है सेना का ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब जो पाक आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूद करने के लिए चलाया जा रहा है।
इससे पहले भी सेना ने कई अभियान चलाए लेकिन इस बार उसे अवाम के साथ-साथ राजनीतिक दलों का भी समर्थन हासिल है। सेना को कई अहम कामयाबियां भी मिली और तालिबान के कई अहम ठिकानों को तबाह कर दिया गया।
तालिबान को भी कमजोर होने का अहसास होने लगा था, जिसके चलते जब वह कुछ और न कर सके तो बदले के नाम पर आर्मी स्कूल पर हमला कर सैकड़ों मासूमों को कत्ल कर दिया।
तालिबान की इस हैवानियत से अवाम में बेहद गुस्सा है। चाहे वह सोशल मीडिया हो या गली-मोहल्ले हर तरफ इसकी निंदा की जा रही है और बच्चों के खून का बदला लिए जाने की बात की जा रही है। पाक सेना भी पीछे हटने वालों में से नहीं है और मुझे उम्मीद है कि तालिबान की इस हरकत का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
पाकिस्तान की दोमुंही नीति का नतीजा है हमला: नरेश चंद्रा, पूर्व राजनयिक
मैं समझता हूं कि पेशावर में आर्मी स्कूल के भीतर मासूम बच्चों के कत्लोगारत के बाद अब पाकिस्तानी हुक्मरानों को चाहिए कि वे अपने मुल्क में पब्लिक के बीच जाएं और आतंकवाद के खिलाफ माहौल बनाएं। मुझे पूरा यकीन है कि पाकिस्तानी अवाम में इस हमले के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा होगा। इसलिए पाक सेना, आईएसआई और सरकार को चाहिए कि वे एक तरफ भारत के खिलाफ तालिबानी ताकतों को खड़ा करने की नीति और दूसरी तरफ अफगानिस्तान में उन्हें मारने के दोगलेपन पर काम करना बंद करे। मैं तो मानता हूं कि यह हादसा इसी दोमुंही नीति का नतीजा था, क्योंकि तालिबानी लड़ाके फौज से सीधी टक्कर लेने के बजाय उनके बीवी-बच्चों को आसान शिकार बना सकते थे, और उन्होंने ऐसा करके दिखा भी दिया।
मुझे इस बात पर भी हैरत है कि पाकिस्तान में इतने बड़े हादसे के बाद वहां की सुरक्षा एजेंसियां बहुत देर तक स्कूल घेरने की कार्रवाई करती रहीं, जबकि उन्हें अंदर घुसकर सीधा एक्शन लेना चाहिए था, जैसा मुंबई हमले के दौरान भारत ने किया या सिडनी में ऑस्ट्रेलिया ने किया। क्योंकि ये आतंकवादी वहां बातचीत करने के लिए नहीं, बल्कि अफगानिस्तान में हुई पाक सेना की तालिबान के खिलाफ हुई कार्रवाई का बदला लेने के लिए आए थे। मतलब साफ है कि पाकिस्तानी नेता और सुरक्षा एजेंसियां इसी तरह अपनी दोगली नीति अपनाते रहने के लिए मजबूर हो चुके हैं।
मुझे तो लगता है कि ये मक्कार हुक्मरान अब एक बार फिर अपनी पुरानी बकवास शुरू कर देंगे कि यह सब हिंदुस्तान की कारस्तानी है। लेकिन मैं समझता हूं कि वहां की अवाम अब सब कुछ समझ चुकी है, इसलिए कश्मीर जैसे मुद्दों पर लोगों का ध्यान भटकाने से कुछ हासिल नहीं होगा। मुसीबत यह है कि पाक आर्मी ने नॉर्थ-वेस्ट, पख्तूनख्वाह और वजीरिस्तान में जिन आतंकी संगठनों को ट्रेनिंग देकर भारत के खिलाफ हवा दी है उन सिरफिरों को वहां इस तरह की वारदात करने से रोक कैसे पाएंगे ? यदि आर्मी अब पीछे हटी तो उसके लिए अपनी गरिमा को सुरक्षित रखना भी मुश्किल हो जाएगा।
तालिबान के खिलाफ सख्ती बरतनी चाहिए: एहतेशाम उल हक (पाक पत्रकार)
एक खौफनाक वारदात थी पेशावर के आर्मी स्कूल के बच्चों पर दहशतगर्दों का हमला, इस हादसे के बारे में जब सुबह ग्यारह बजे के आसपास पता चला तो सन्न रह गया। पहले भी पाकिस्तान में स्कूल और स्कूली बच्चों पर हमलों की वारदात होती रही हैं, लेकिन सैकड़ों बच्चों का एक साथ मारा जाना बहुत खतरनाक था। अब केवल इतना कह सकता हूं कि पाक हुक्मरानों और फौज को तालिबानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना चाहिए।
मेरा साफ-साफ मानना है कि दहशतगर्दी को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन उसके खिलाफ सख्ती जरूरी है वर्ना इसी तरह कई बच्चे मौत को गले लगाते रहेंगे। तालिबानियों के हमले तो जुलाई से ही पाकिस्तान में जारी हैं लेकिन जब दहशतगर्दों ने देखा कि फौज पर तो सीधा हमला इतनी बड़ी तबाही नहीं ढा सकता तो उन्होंने बच्चों को सॉफ्ट टार्गेट बनाया। पाकिस्तान के वजीरे आजम नवाज शरीफ ने पहली बार अफगानिस्तान के प्रेसिडेंट अशरफ गनी के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ जो मुहिम चलाई है यह हमला उसी के चलते हुआ है, लेकिन अब यदि पाक आर्मी ने अपने कदम पीछे किए तो बहुत बुरा होगा।
मुझे लगता है कि इन दहशतगर्दों को आज भी पाकिस्तानी पॉलिटिक्स का समर्थन है, जिसे खत्म होना चाहिए लेकिन अब यह कहना फिजूल की बात है कि पाकिस्तानी हुकूमत इन्हें आर्थिक मदद कर रही है। भारत में अक्सर आज भी कश्मीर में दहशतगर्दी के लिए पाकिस्तान को जिम्मेवार ठहराया जाता है, जो बेबुनियाद है। मुझे लगता है कि कश्मीर की बात का अब वक्त नहीं रहा, क्योंकि पाक हुकूमत की मदद दहशतगर्दों को मिल ही नहीं रही है, अन्यथा ये लोग पाकिस्तान के खिलाफ ही इतनी बड़ी वारदात को अंजाम क्यों देते ?