वोट के लिए सांप्रदायिकता के खतरनाक खेल में लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के बीच अघोषित मिलीभगत है।
सभी पार्टियां सांप्रदायिक माहौल गरमाने में अपना फायदा देख रही हैं। यह कहना है दो माह पूर्व केंद्रीय गृह सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए आरके सिंह का।
सिंह ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि कई पार्टियां वोटों के ध्रुवीकरण के चलते एक खास समुदाय के पक्ष में ज्यादा झुकी हुई दिख रही हैं। इससे दूसरे समुदाय में असुरक्षा की भावना व्याप्त होती है।
प्रतिस्पर्धा वाले राजनीतिक दल इस असुरक्षा की भावना को हवा देकर सांप्रदायिक आग फैलाने में अपना हित देख रहे हैं।
मुजफ्फरनगर दंगे का उदाहरण देते हुए सिंह ने कहा कि सरकार ने जानबूझ कर वहां ऐसे अधिकारियों को बहाल किया जो उनके राजनीतिक डिजाइन में खड़े उतरें।
सिंह के मुताबिक एक समुदाय में सरकार से न्याय की नाउम्मीदगी ने उन्हें हथियार उठाने की वजह दे दी।
सिंह का मानना है कि किसी खास समुदाय के सरकार और राजनीतिक नेतृत्व से न्याय नहीं मिलने के डर के बीच ही सांप्रदायिकता जड़ पकड़ती है।
ऐसा नहीं कि सरकारें इसे नहीं समझ रहीं। चूंकि इसमें सभी राजनीतिक दलों का फायदा है इसलिए इस बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता।
सिंह के मुताबिक मुजफ्फरनगर दंगा सीधे तौर पर राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन की नाकामी है। ज्यादातर राजनीतिज्ञों की छोटी मानसिकता के चलते सांप्रदायिकता का चेन रिएक्शन शुरू होने का पूरा खतरा मंडरा रहा है।
इसके लिए किसी भी कीमत पर वोट बैंक को हासिल करने वाली पार्टियां ही पूरी तरह जिम्मेदार हैं।
सिंह के मुताबिक अगर प्रशासन चाहे तो इस हालात पर ब्रेक लगा सकता है। उसे सिर्फ न्याय ही नहीं करना होगा, बल्कि उसका संदेश भी देना होगा।