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'ऐसे तो सरकार का कामकाज ठप हो जाएगा'

Sat, 30 Nov 2013 08:26 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि सरकार के सभी फैसलों को संदेह से देखा जाएगा तो उसका कामकाज ही ठप हो जाएगा।
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अदालत ने अहमदाबाद में एक निजी कंपनी के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा शहर का विकास करने के गुजरात सरकार के निर्णय को सही ठहराते हुए यह टिप्पणी की। राज्य सरकार के इस निर्णय पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने आपत्ति की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि संसदीय प्रणाली में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) मुख्य व्यक्ति है, लेकिन शासन तो सरकार करती है और वही जनता के प्रति जवाबदेह है।
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जस्टिस केएस राधाकृष्णन और एके सीकरी की बेंच ने कहा कि निविदा आमंत्रित नहीं करने या सार्वजनिक नीलामी नहीं होने के आधार पर सरकार की कार्रवाई को मनमाना या अनुचित नहीं ठहराया जा सकता है।

बेंच ने कहा कि यदि शासन के प्रत्येक निर्णय को बारीकी और संदेह की निगाह से परखा जायेगा तो प्रशासन ही ठहर जायेगा और फैसला लेने वालों में पहल करने का उत्साह ही खत्म हो जायेगा।

अदालत ने कहा कि फैसला करने वालों की कार्रवाई पर टिप्पणी करना या उनकी आलोचना करना आसान है। कई बार शासन या उसके प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लिये गये निर्णय गलत हो सकते हैं और कई बार अपेक्षित परिणाम मिल सकते हैं। संसदीय लोकतंत्र में आलोचना का हमेशा स्वागत है, लेकिन अच्छी मंशा से किये गये फैसलों का अनादर नहीं किया जा सकता। भले ही अंतत: ऐसा निर्णय गलत ही क्यों न हो जाए।

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इस मामले में सरकार ने गुजरात इंटरनेशनल फाइनेशियल टेक सिटी लि. नाम से संयुक्त उपक्रम के लिये 12 मार्च, 2011 को इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के साथ समझौता किया था और सरकार ने इस उपक्रम के लिये 412 एकड़ भूमि आवंटित की थी।

राज्य सरकार के निर्णय को अदालत में चुनौती देते हुए यह आरोप लगाया गया था। याचिका में इस मामले की सीबीआई जांच का अनुरोध किया गया था। कैग की रिपोर्ट में भी इस परियोजना पर सवाल उठाये गये थे।

सर्वोच्च अदालत ने पक्षपात के सभी आरोपों को दरकिनार करते हुए कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि शासन ने जनहित के खिलाफ काम किया।

बेंच ने कहा कि शासन और प्रशासन जनहित में उचित आर्थिक नीति के अनुरूप परिस्थितियों के अनुसार आर्थिक और प्रबंधन के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। हमारा मानना है कि यह विशुद्ध रूप से राज्य सरकार के नीतिगत निर्णय हैं और ऐसा करते समय उसने इस परियोजना से राज्य और राज्य की जनता को होने वाले लाभ पर विचार किया था।
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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की आपत्तियों के बारे में अदालत ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण मशीनरी है लेकिन जनता की जरूरतों के बारे में शासन ही बेहतर जवाब देता है।

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