अमर सिंह अब भले ही समाजवादी पार्टी का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन उन पर अखिलेश सरकार की मेहरबानी एक बार फिर साफ तौर पर दिखाई दे रही है। पूर्व सपा महासचिव अमर सिंह की 55 फ र्जी कंपनियों के खिलाफ मनी लांड्रिंग के मामले में पिछले तीन सालों से चल रही आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की जांच को महज पांच दिनों में समेट दिया गया।
यूपी पुलिस ने न केवल अमर सिंह के खिलाफ चल रहे मुकदमे को बंद कर दिया बल्कि इसकी सूचना अदालत को भी दे दी है। कहा जा रहा है कि आनन-फानन पेश की गई रिपोर्ट में केस जारी रखने के लिए पर्याप्त सुबूत न होने की दलील दी गई है।
मुकदमा दर्ज कराने वाले शिवाकांत त्रिपाठी ने इसे बेहद गंभीर मामला बताया है। उन्होंने अमर उजाला को बताया कि ईओडब्ल्यू और ईडी ने अपनी जांच में कई अहम तथ्य जुटाए थे, लेकिन सरकार ने इन एजेंसियों पर भरोसा करने के बजाय इसे इसे यूपी पुलिस को सौंप दिया। यूपी पुलिस ने मामले में सभी तथ्यों को नजरंदाज करते हुए अदालत में एक पेज की क्लोजर रिपोर्ट लगाई है, जिसमें सुबूतों के अभाव में केस बंद करने की बात कही जा रही है।
त्रिपाठी ने कहा कि वे इस मामले में अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। शुक्रवार को वकीलों के बहिष्कार आंदोलन की वजह से वह इस बारे में अदालती काम आगे नहीं बढ़ा पाए पर वे अडिग हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की कंपनी के केस की तरह ही है।
कानपुर निवासी त्रिपाठी ने अमर सिंह के खिलाफ 15 अक्तूबर 2009 को कानपुर के बाबूपुरवा थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। इस केस में कहा गया था कि 55 से अधिक कंपनियां बनाकर और कंपनियों का एक-दूसरे में विलय कर बड़े पैमाने पर मनी लांड्रिंग की गई है। चूंकि मुकदमे में लगे आरोप में घोटाले की रकम कई सौ करोड़ की थी, लिहाजा तत्कालीन सरकार ने मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दी थी।
इस बीच अमर सिंह ने अदालत में रिट दाखिल कर इस मामले में गिरफ्तारी से राहत और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी। अमर सिंह की रिट के बाद वादी शिवाकांत त्रिपाठी ने जनहित याचिका दायर कर दी, जिसकी सुनवाई के दौरान ही अदालत ने मनी लांड्रिंग के आरोपों को देखते हुए मई 2010 में मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से कराने के निर्देश दे दिए। ईडी ने जांच के तहत अमर सिंह से जुड़ी दर्जनों कंपनियों के निदेशकों को नोटिस भेजा था। जिन्हें नोटिस दिया गया उनमें अमर सिंह के अलावा उनकी पत्नी पंकजा सिंह, फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन के अलावा कंपनियों के निर्देशक व दो चार्टर्ड अकाउंटेंट शामिल थे।
ईडी ने मामले की जांच शुरू की और बाद में उसने जून 2011 में अदालत को यह रिपोर्ट सौंपी कि इस पूरे प्रकरण में आपराधिक मामलों की विवेचना करने में वह सक्षम नहीं है, लिहाजा आईपीसी के तहत बनने वाले अपराधों की जांच किसी और एजेंसी से कराई जाए। अदालत ने ईडी की इस रिपोर्ट पर कुछ दिनों पहले फैसला लिया और राज्य सरकार से कहा कि वह इस मामले की जांच किसी ‘एजेंसी’ से कराए।
इस बीच ईओडब्ल्यू में मामले की जांच रुकी रही। सरकार ने अदालत के इस निर्देश का अपने तरीके से पालन किया और 28 अक्तूबर 2012 को ईओडब्ल्यू के अधिकारियों को आदेश दिए कि संबंधित जांच तत्काल प्रभाव से कानपुर के बाबूपुरवा थाने को वापस कर दी जाए।
प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव के उप सचिव एसएस चौहान ने इसके लिए ईओडब्ल्यू व कानपुर पुलिस दोनों को ही लेटर भेजा। कानपुर पुलिस ने इसके बाद जांच अपने हाथ में ली और चार दिनों में यह फैसला कर दिया कि अभियोजन चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो रहे हैं लिहाजा जांच बंद किए जाने योग्य है।
कानपुर में इस मामले की जांच सीओ बाबूपुरवा पवित्र मोहन त्रिपाठी ने की। पता चला है कि सीओ बाबूपुरवा शुक्रवार को जिला जज के यहां पुलिस द्वारा मामले में लगाई गई फाइनल रिपोर्ट की फाइल लेकर गए थे, पर अधिवक्ताओं की हड़ताल की वजह से इसमें औपचारिक कार्रवाई नहीं हो सकी। सीओ ने इसके बाद भी कानपुर पुलिस की रिपोर्ट जिला जज के कार्यालय में रिसीव करा दी थी।
बच्चन को बचाने की कोशिश तो नहीं
इस मामले में अखिलेश सरकार के फैसले को लेकर राजधानी के सियासी हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग इसे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का अपने पुराने साथी के प्रति दरियादिली का नतीजा मान रहे हैं तो कुछ इसे अमिताभ बच्चन को राहत दिलाने की कोशिशों से जोड़कर देख रहे हैं।
मामला उठाने वाले शिवाकांत त्रिपाठी कहते हैं कि अमर सिंह की दो कंपनियों के बोर्ड में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन लाभ वाले पद पर मौजूद थे। लिहाजा इस पूरे मामले में वह भी कहीं न कहीं फंसते नज़र आ रहे थे। जांच एजेंसियों ने जांच के दौरान उन्हें भी पूछताछ का नोटिस दिया था।
ऐसे में साफ है कि इस मामले की लीपापोती से न केवल अमर सिंह को राहत पहुंचाने की कोशिश की जा रही है बल्कि अमिताभ बच्चन को भी इस केस के बंद होने से फायदा पहुंचेगा। कहने की जरूरत नहीं कि अमिताभ की पत्नी जया बच्चन सपा की महासचिव हैं और पार्टी में उनका खासा प्रभाव भी है।
क्या बुखारी कर रहे हैं अमर सिंह की फील्डिंग
सपा सरकार की ओर से अमर सिंह को राहत पहुंचाने वाले फैसले के पीछे कहीं अब्दुल्ला बुखारी का हाथ तो नहीं। सूत्र बताते हैं कि अमर सिंह ने बुखारी के जरिये सपा सुप्रीमो तक इस मामले में अपनी अर्जी पहुंचाई है। बुखारी जहां सपा सुप्रीमो के बेहद करीबी है वहीं अमर से भी उनकी अच्छी दोस्ती बरकरार है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि उनकी मध्यस्थता की वजह से ही अमर के लिए सपा सरकार की इनायत बरस रही है।
घटनाक्रम
- 15 अक्टूबर 2009 को कानपुर के शिवाकांत त्रिपाठी ने बाबूपुरवा थाने में अमर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया।
- सरकार ने जांच ईओडब्ल्यू को सौंपी।
- ईओडब्ल्यू ने इस मामले की जांच शुरू की। जांच एजेंसी ने 24 से अधिक डायरेक्टरों और सौ अन्य लोगों के बयान दर्ज किए।
- ईओडब्ल्यू ने जांच में पाया कि कई कंपनियां बनाकर उनका आपस में विलय दिखा कर चार सौ करोड़ रुपये से अधिक की मनी लाउंड्रिंग की गई।
- अदालत के निर्देश पर मामले की जांच 20 मई 2010 को ईडी को सौंपी गई। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय प्रकरण की जांच एक माह में पूरी कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए थे।
- ईडी ने जांच में अमर सिंह, उनकी पत्नी पंकजा और फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के अलावा कोलकाता के महेंद्र सिंह राना, बाबूलाल बंका, गोपाल बंका, मनोहर लाल नगलिया, अशोक कुमार झांवर, गिरिराज किशोर, ललित कुमार सडाना और अरुण नगलिया, गाजियाबाद के दिनेश प्रताप सिंह और कानपुर के देवपाल सिंह को नोटिस भेजा।
- ललित कुमार सडाना और अरुण नगलिया अमर सिंह के चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और उनकी कुछ कंपनियों में डायरेक्टर भी हैं। इसके अलावा फ्लेक्स कंपनी के अशोक चतुर्वेदी और मनोज कुमार बंका को भी नोटिस भेजा गया। यह दोनों भी कुछ कंपनियों के डायरेक्टर थे।
- ईडी ने इस मामले में सेबी मुंबई और रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज, कोलकाता को भी नोटिस भेजा था।
- 28 अक्टूबर 2012 को सरकार ने मामले की जांच वापस कानपुर के बाबूपुरवा थाने को सौंप दी।
- दो नवंबर 2012 को कानपुर पुलिस ने मामले में फाइनल रिपोर्ट लगाकर अदालत को अपनी कार्रवाई से अवगत करा दिया।