झारखंड के हाथ से निकल जाने के बाद भाजपा अब बिहार को लेकर भी खासी आशंकित है। खासतौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बदलते तेवरों से भाजपा को लगने लगा है कि देर-सबेर जद-यू भी अलग राह पकड़ सकता है।
बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार को अकेले दम पर बहुमत पाने के लिए मात्र सात विधायकों की आवश्यकता है। प्रदेश विधानसभा के 243 सदस्यों में से जद-यू के 115 व भाजपा के 91 विधायक हैं। इस तरह नीतीश बहुमत के लिए जरूरी 122 के संख्याबल से मात्र सात कम हैं।
पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री के बदले तेवरों के चलते भाजपा नेतृत्व भी मानने लगा है कि उन्होंने निर्दलीय व अन्य दलों के विधायकों के सहारे अपना बहुमत जुटा लिया है। भाजपा को यह भी आशंका है कि नीतीश उनके दल में भी सेंध लगा सकते हैं।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि पार्टी नेतृत्व को आशंका है कि नीतीश देर-सबेर ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की तरह भाजपा को पटखनी दे सकते हैं। वैसे भी नीतीश कुमार भाजपा के सबसे सफल मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में खुलकर सामने आते रहे हैं।
अब सांसद शिवानंद तिवारी के राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ प्रमुख मोहन भागवत के खिलाफ दिए बयान को भी भाजपा और जद-यू के तल्ख होते संबंधों का नतीजा माना जा रहा है। तिवारी इस समय नीतीश कुमार के खासे निकट माने जाते हैं।
यह बात लंबे समय से सामने आती रही है कि बिहार में भाजपा और जद-यू के संबंध पहले जैसे मधुर नहीं रह गये हैं। अब भाजपा हाईकमान भी यह महसूस करने लगा है। बहरहाल, अगर बिहार में झारखंड दोहराया जाता है तो भाजपा के लिए यह तगड़ा झटका होगा।