बीजेपी संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समिति और एनडीए के अध्यक्ष पद जैसी महत्वपूर्ण इकाइयों से आडवाणी को दरकिनार करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद मोदी अब उन्हें एक और झटका देने की तैयारी कर रहे हैं।
ऐसा माना जा रहा है लाल कृष्ण आडवाणी की को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद का अध्यक्ष पद भी नहीं दिया जाएगा, जबकि आडवाणी की इच्छा है कि उन्हें ये पद दिया जाए। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद एक केंद्रीय इकाई है जिसका मकसद पूरे देश में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना है।
पार्टी के कई महत्वपूर्ण पदों और समितियों में शामिल न किए जाने के बाद लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इस वक्त जद्दोजहद में हैं कि वे पार्टी में खास पद पर रहते हुए किसी तरह अपनी जगह बनाएं रखें।
ना आडवाणी ना जोशी
दरअसल, पिछले दिनों पहले ऐसी खबरें आई थीं कि मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हैं। पार्टी के दोनों वरिष्ठ नेता परिषद का अध्यक्ष बनने के इच्छुक भी बताए गए।
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों नेताओं इच्छा का सम्मान करने के मूड में नहीं हैं। मोदी सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष के रूप में ना आडवाणी ना जोशी को चुनने के पक्ष में हैं।
खबर के अनुसार नरेंद्र मोदी सांस्कृतिक परिषद के अध्यक्ष पद के लिए एक ऐसे चेहरे की खोज में हैं जो युवा हो और जिसे राजनीति का अनुभव भी हो। उसका काम काज इस तरह का रहा हो जिससे उसे भारत की संस्कृति की जानकारी हो।
जो व्यक्ति दावेदार
और इस पद के लिए अभी जिस व्यक्ति को दावेदार माना जा रहा है वह चंडीगढ़ से बीजेपी सांसद किरण खेर हैं। हालांकि इस मामले में किरण खेर के नाम की सुर्खियों के बाद उन्होंने कहा कि अभी तक इस तरह की किसी भी बात पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
माना जा रहा है कि भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष पदे के अलावा किरण खेर को अगला सेंसर बोर्ड अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है। इस बात की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं कि आने वाले वक्त में वे दोनों पद की जिम्मेदारी संभालें।
हालांकि इस पूरी उथलपुथल के बीच आडवाणी खेमा अब भी उम्मीद लगाए बैठा है। माना तो यह भी जा रहा है कि इस पूरे मामले में और अध्यक्ष पद की नियुक्ति में सुषमा स्वराज की अपनी राय होगी लेकिन इस मामले में उन्होंने अभी तक सामने आकर कोई बात नहीं कही है।
आडवाणी समर्थकों की अपनी राय
कहा यह भी जा रहा है कि जो भी निर्णय होगा वह नरेंद्र मोदी ही करेंगे, क्योंकि इस परिषद पर प्रधानमंत्री का प्रशासनिक अधिकार है।
विपक्ष के एक सांसद का कहना है कि सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष पद का चुनाव एक कठिन काम है क्योंकि यही परिषद शिक्षा और संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण चीजों का काम देखता है।
इस पूरी प्रक्रिया के बीच बीजेपी में आडवाणी समर्थक अपना तर्क देते हुए यह कह रहे हैं कि आडवाणी अभी तक स्वास्थ से ठीक हैं। और वे इस बात के लिए तैयार हैं कि आडवाणी इस नई जिम्मेदारी को निभाएं। और यह भी कि वे अपनी उम्र और तजुर्बे के अनुसार किस तरह इस पद के लिए हकदार हैं।
एक समर्थक के अनुसार अगर कांग्रेस अपने सबसे वरिष्ठ सांसद को इस पद की जिम्मेदारी दे सकता है तो बीजेपी क्यों नहीं? उन्होंने यूपीए सरकार में करण सिंह का उदाहरण देते हुए यह बात कही। करण सिंह यूपीए के समय 10 साल तक सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष थे और पिछले ही महीने उनका कार्यकाल पूरा हुआ है। सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल तक का होता है जिसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।