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90 के नीरजः पढ़िए, कैसा रहा गोपालदास का कारवां

Sat, 04 Jan 2014 01:30 PM IST
अमर उजाला दिल्ली
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कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे, स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
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नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई, पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई, पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई, गीत अश्क़ बन गए, छंद हो दफ़न गए, साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये, और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके, उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा, क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा, इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा, थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा, एक दिन मगर यहाँ, ऐसी कुछ हवा चली, लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली, और हम लुटे-लुटे, वक्त से पिटे-पिटे, साँस की शराब का खुमार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
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हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ, होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ, दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ, और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ, हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर, वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर, और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे, ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन, ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण, शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन, गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन, पर तभी ज़हर भरी, ग़ाज एक वह गिरी, पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी, और हम अजान से, दूर के मकान से, पालकी लिये हुए कहार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

आज भी जारी है 'नीरज' का कारवां

शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब, होगा जो नशा यूं तैयार...वो प्यार है।

प्यार को इसी तरह परिभाषित करने वाले प्रसिद्ध गीतकार पद्मभूषण गोपाल दास ‘नीरज’ 4 जनवरी को उम्र के 90 वें पड़ाव पर पहुंच रहे हैं। इस मुकाम पर भी नीरज की रचनाधर्मिता का कारवां अभी भी गतिमान है।

1924 को इटावा के गांव इकदिल में पैदा हुए नीरज के जीवन की शुरुआत बेहद संघर्षपूर्ण रही। काव्य जगत में गीत और फिल्मों के गीतों में कवित्व को जिंदा रखने वाले नीरज के दर्जनों गीत संग्रह प्रकाशित हुए और अभी भी बेहद लोकप्रिय हैं।

नीरज का बॉलीवुड सफर

फिल्मों में भी नीरज ने सवा सौ से ज्यादा गीत लिखे जो आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। देवानंद, राजकपूर, मनोज कुमार, राजेंद्र भाटिया, रोशन, शंकर जयकिशन, एसडी बर्मन के साथ नीरज की जोड़ी खूब जमी।

नीरज के गीतों में लालित्य है, संगीत है, सूक्ष्म मानवीय संवेदनाएं हैं तो सामाजिक विसंगतियों पर कठोर प्रहार भी है। साथ ही मानवीयता के लिए संदेश भी है।

नीरज कहते हैं,
‘आदमी को आदमी बनाने के लिए
जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए
और कहने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं आंखों वाला पानी चाहिए’

कैसे शुरू हुआ फिल्मी सफर

यह बात 1970 के आस-पास की है। राजकपूर के बुलाने पर नीरज डीएस कॉलेज से छुट्टी लेकर मुंबई गए। ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म के लिए नीरज को गीत लिखना था। चार दिन गुजर गए लेकिन राजकपूर कुछ तय नहीं कर पा रहे थे।

तब नीरज ने कहा देखिए राज जी, इस गीत को जोकर गाएगा। जोकर से न तो गजल, न ठुमरी, न कव्वाली या किसी सिद्ध शैली के गायन की अपेक्षा नहीं की ज सकती। विस्मय से नीरज को देखते हुए राजकपूर ने कहा तो फिर क्या हो? तब नीरज ने कहा आम बोल चाल की भाषा। वह भाषा जो आसान भी हो लेकिन अर्थ गूढ़ हो।

इसके बाद नीरज ने अपनी शैली में राजकपूर को सुनाया..‘ऐ भाई जरा देख के चलो, आगे भी नहीं पीछे भी.’ राजकपूर को पहली बार में ही गीत जम गया। लेकिन शंकर-जयकिशन ने धुन बनाने में असमर्थता व्यक्त की। इस पर नीरज की शैली को ही संगीत में ढाला गया। गीत कालजयी है और इसका दर्शन सर्वविदित है।
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नीरज के कुछ बेहद लोकप्रिय फिल्मी गीत

-कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे-नई उमर की नई फसल
-रंगीला रे..तेरे रंग में यूं रंगा है-प्रेम पुजारी
-चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है- गैंबलर
-जैसे राधा ने माला जपी श्याम की मैंने ओढ़ी- तेरे मेरे सपने
-बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं- पहचान
-खिलते हैं गुल यहां खिल के बिखरने को-शर्मीली
-लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में, हजारों रंग के-कन्यादान
-आप यहां आए किसलिए, आप ने बुलाया इसलिए- कल, आज और कल
-मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया- शर्मीली
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