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बिन पांव भी नहीं खोया हौसला, सब्जी वाले की बेटी बनी मिसाल

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किस्मत के हाथों थोड़ी सी चोट खाकर ही हौसला खो देने वाले लोगों के लिए मुंबई की रोशन जव्वाद की कहानी एक प्रेरणास्रोत हो सकती है। एक ट्रेन हादसे में अपने दौनों पैर खोकर भी डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली गरीब सब्जी वाले की बेटी रोशन के साथ नियति ने ही क्रूर मजाक नहीं किया सिस्टम भी कदम कदम पर उसकी राह में बाधा बनकर खड़ा रहा।
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लेकिन रोशन न हारी, न रुकी और अपनी मंजिल तक पहुंचकर ही दम लिया। रोशन के इस संघर्ष का भी उस समय सुखद अंत हुआ जब मुंबई के एक प्रतिष्ठित कालेज से उन्होंने प्रथम श्रेणी में एमबीबीएस की परीक्षा पास की।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार मुंबई के जोगेश्वरी की रहने वाली 23 साल की रोशन जव्वाद ने साल 2008 में एक ट्रेन हादसे में अपनी दोनों टांगे खो दी थी। कुछ दिन पहले ही रोशन ने दसवीं की परीक्षा 92.5 फीसदी अंकों के साथ पास की थी।
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बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली रोशन को इस हादसे ने झकझोर कर रख दिया। लेकिन उन्होंने अपना हौसला नहीं खाया और पहले बारहवीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की और फिर मेडिकल परीक्षा की तैयारियों में जुट गई।

कालेज ने प्रवेश देने से कर दिया था इंकार

रोशन के पिता सब्जी का ठेला लगाते हैं, और जैसे तैसे ही परिवार के लिए गुजर बसर का इंतजाम कर पाते हैं। पिता की हालात को देख रोशन ने घर पर ही परीक्षा की तैयारी की और जल्द ही मेडिकल एंट्रेस पास कर लिया। लेकिन खुशियां तो अभी उससे दूर थी क्योंकि किस्मत के बाद अफसरशाही भी उसकी राह में रोड़े अटकाने के लिए तैयार बैठी थी।

नियमों के मुताबिक 70 फीसदी तक विकलांग व्यक्ति को एमबीबीएस में प्रवेश मिल सकता था लेकिन रोशन 88 फीसदी तक विकलांग थी। इसलिए मेडिकल कालेज ने उसे प्रवेश देने से इंकार कर दिया। रोशन ने इसे चुनौती देते हुए बांबे हाइकोर्ट का रुख किया।

कोर्ट ने उसकी याचिका पर संबंधित कालेज को उसे प्रवेश देने का आदेश दिया। मंगलवार को केईएम कालेज का एमबीबीएस का रिजल्ट आया, रोशन ने भी प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास की।

जोगेश्वरी की एक चॉल में 10x10 के एक किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रहने वाली रोशन काफी खुश दिखाई दे रही थी। बात करने पर उसने बताया कि कोर्ट में लड़ाई लड़ने से लेकर मेडिकल की पढ़ाई करने तक कई बार आर्थिक के साथ विभिन्न दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
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कोर्ट ने कहा- यह लड़की रोज कोर्ट आ सकती है तो कालेज क्यों नहीं

उसने बताया कि जब उसका मामला कोर्ट पहुंचा तो मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह ने कालेज से कहा, कि जब यह लड़की रोज कोर्ट आ सकती है तो तुम्हें क्या लगता है यह क्लास में नहीं आ सकती। इस पर कालेज कोई जवाब नहीं दे पाया।

रोशन ने बताया कि उसकी इस लड़ाई में कुछ लोगों ने उसका बहुत सहयोग किया, खासकर आर्थोपेडिक सर्जन डा. संजय कंथारिया ने, जिन्होंने मुझे बेटी की तरह रखा और हर कदम पर मेरा हौसला बढ़ाया। 2008 में हादसे के बाद मैं अपनी पढ़ाई भी नहीं कर पा रही थी लेकिन उनकी मदद के बाद मैंने एमएचसीईटी का एग्जाम क्लियर किया।

इसके बाद जब मेडिकल टेस्ट के लिए मैं जेजे हॉस्पिटल गई तो डॉक्टरों ने बताया कि 40 से 70 फीसदी विकलांग को ही मेडिकल में प्रवेश मिल सकता है। जबकि मुझे तो 88 फीसदी तक विकलांग घोषित कर दिया गया। इस पर डॉक्टर कंथारिया ने मुझे कोर्ट जाने की सलाह दी।

वहां मैं वरिष्ठ वकील वीपी पाटिल से मिली जो मेरा केस मुफ्त में लड़ने के लिए तैयार हो गए। जब मैं घायल थी तो विधायक अमीन पटेल मुझे देखने के लिए अस्पताल आए थे, उन्होंने और मुझे मेडिकल की पढ़ाई के लिए फीस भरने का प्रस्ताव दिया।

इसके बाद मेरी पूरी पढ़ाई में उन्होंने मेरी मदद की। मेरा जज्बा देख मेरे क्लास के प्रोफेसर, वरिष्ठ डॉक्टर और मेरे साथियों ने भी कदम कदम पर उत्साह बढ़ाया। उन्होंने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि मैं विकलांग हूं। अब रोशन पीजी मैं एडमिशन लेने की तैयारी में है। उसकी मां अंसरी खातून कहती हैं कि हम बहुत गरीब लोग हैं। हादसे ने हमारी पूरी जिंदगी बदल कर रख दी। मैं हर समय अल्लाह से दुआ करती थी कि उसकी मदद करे।
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