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सात ऐसी 'नाकामियां', जिनसे उठी मोदी पर उंगली

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आज से करीब एक साल पहले देश में हुए आम चुनावों में यहां की आवाम ने ऐसा फैसला सुनाया जो वाकई चौंकाने वाला था। भारतीय जनता ने एक-जुट होकर सत्ता की बागडोर किसी एक पार्टी को या कहें कि एक इंसान को ही सौंप दी। वो शख्स कोई और नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे।
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लोकसभा चुनावों में मोदी ने जिस तरह से 'अच्छे दिन' के सपने जनता के सामने संजोए उससे जनता को उन पर अटूट विश्वास सा जग गया। इसीलिए तो देश में 1984 के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब किसी एक पार्टी ने केंद्र में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। इन चुनावों में मोदी फैक्टर ने जमकर अपना असर दिखाया।

यूपीए सरकार के दौरान हुई गलतियों, घोटालों और सरकार के उठाए गए कदमों को मोदी ने जमकर भुनाया। मोदी ने तत्कालीन मनमोहन सरकार को 'घोटालों की सरकार' कह के संबोधित किया। इतना ही नहीं उन्होंने चुनावों में 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा दे दिया।
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ये मोदी का अंदाज ही था कि देश की जनता उनके समर्थन में खड़ी हुई और 'अच्छे दिन' के लिए नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री चुना। लेकिन पिछले एक साल के मोदी के राज पर गौर करें तो क्या वाकई देश की आवाम के लिए 'अच्छे दिन' आए? ये सवाल इसलिए क्योंकि इस एक साल में कई ऐसी घटनाएं सामने आई जिसने मोदी सरकार की साख पर बट्टा लगाया है। मोदी सरकार की 7 'नाकामियां' जिससे उनका 'मैजिक' प्रभावित होता दिखाई दिया।

'अल्पसंख्यकों पर बढ़े हमले'

'मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं।' ये हम नहीं कह रहे बल्कि अमेरिका के एक पैनल की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया है।

यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने 2015 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से भारत में अल्पसंख्यकों को हिंसक हमलों, जबरन धर्मांतरण और घर वापसी जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

पैनल ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र होने के बावजूद भारत को अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों की सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों में धार्मिक हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं।

हालांकि इस रिपोर्ट के सामने आने के तुरंत बाद सरकार की ओर से सफाई भी आ गई। भारत सरकार ने इस अमेरिकी रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। गृह मंत्रालय ने एक नया रिकॉर्ड सबके सामने रखा। जिसमें उन्होंने बताया कि देश में अल्पसंख्यंकों पर हमले पिछली सरकारों से कम हुए हैं।

'सूट-बूट' की सरकार से आम जन की टूटी आस

चाहे आम चुनावों के दौरान की बात हो या फिर सत्ता संभालने के बाद की स्थिति हो। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बातों से लोगों के दिलों पर राज जरूर किया। उन्होंने लगभग सभी मुद्दों पर अपने बयानों से जनता के बीच जगह बनाई। जनता ने उनमें अपने नायक की छवि देखी।

शायद यही वजह थी कि लोकसभा चुनावों में उन्हें पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का मौका दिया। लेकिन जिस अंदाज में पीएम मोदी ने जनता के बीच अपनी बातें रखी सत्ता में आने के बाद ये सरकार उससे उलट काम करती दिखाई दी। शायद यही वजह थी कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन महज एक साल लोगों की धारणा बदलने लगी। आज परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं।

एक साल के भीतर आखिर ऐसा क्या हो गया कि जिस शख्स को देश की जनता ने भारी-भरकम बहुमत से सत्ता दी। उससे भरोसा उठने सा लगा है। इसके पीछे वजह और कोई नहीं खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की कार्यशैली है।

जिन मुद्दों की वजह से पीएम मोदी सत्ता में आए अब वो उन्हीं मुद्दों से पीछे हटने लगे। एक के बाद एक यू-टर्न से जनता में उनकी छवि को गहरा धक्का लगा। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के कटाक्ष से सामने आता है। जिसमें उन्होंने इस सरकार को सूट-बूट की सरकार कह कर संबोधित करना शुरू किया है।

राहुल गांधी ने ना केवल मोदी सरकार को इस जुमले से घेरने की कोशिश की है। बल्कि उस सच्चाई को भी बताया है जिसे जनता भी समझने लगी है।

ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को ये समझने की जरूरत है कि जिस जनता ने उन्हें चुना है अगर जल्दी ही इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो हालात बिगड़ भी सकते हैं। जनता का मोहभंग होने में समय नहीं लगता। इसलिए जरूरी यही है कि अब प्रधानमंत्री मोदी बातों और वादों की जगह कुछ ऐसा करें कि जनता को उन पर फिर से विश्वास कायम हो जाए।

किसानों की आत्महत्या से सरकार की किरकिरी

प्रधानमंत्री मोदी ने जब देश की सत्ता संभाली तो उन्होंने किसानों के लेकर कई ऐलान किए। लेकिन उन दावों की पोल एक साल में ही खुल गई। इस दौरान में देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों ने आत्महत्याएं की। एक अनुमान के मुताबिक देश में हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या करता है। साल 2014 में भी आत्महत्या की दर में तेजी आई है।

इन सबके बीच केंद्रीय खुफिया विभाग ने हाल ही किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। जिसमें कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की वजह प्राकृतिक भी है और कृत्रिम भी। इसमें बारिश, ओलावृष्टि, सिंचाई की दिक्कतें, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक वजहें शामिल हैं।

हालांकि इस रिपोर्ट में कहीं भी इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आखिर किसानों की समस्या पर अंकुश कैसे और कब लगेगा? इन सबके बीच अब ये मोदी सरकार को सोचना है कि आखिर कैसे वो देश के 'अन्नदाता' को बचाते हैं? आखिर वादों की जो फेहरिस्त चुनाव में नजर आई थी उसकी बानगी देखना बाकी है।

भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर कटघरे में सरकार

एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूमि अधिग्रहण बिल को वक्त की मांग बताया है। इसके लिए सरकार एक बार नहीं बल्कि दो बार अध्यादेश लेकर आ चुकी है। हालांकि मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल पर पूरा विपक्ष सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व लगभग विपक्ष की सभी पार्टियां इस बिल को सिरे से नकार रही हैं।

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण बिल के मुद्दे पर मोदी सरकार पर अब तक का सबसे बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि सबसे बड़े चोर दिन में सूट-बूट पहन कर आते हैं। उन्होंने मोदी सरकार पर कॉरपोरेट के दबाव में काम करने का आरोप लगाया।

मोदी सरकार जब भूमि अधिग्रहण बिल को पहली बार संसद में ले आई तो पूरा विपक्ष कांग्रेस के नेतृत्व में उठ खड़ा हुआ। उन्होंने संसद से राष्ट्रपति भवन के बीच मार्च किया और इस मुद्दे पर राष्ट्रपति से दखल देने की अपील की। अध्यादेश के जरिए उस समय सरकार भूमि बिल लाना चाहती थी। अब एक बार फिर से सरकार अध्यादेश के जरिए भूमि बिल ला रही।

इन सबके बीच सरकार की ओर से खुद प्रधानमंत्री मोदी ने मोर्चा संभाला हुआ है। उन्होंने इस मुद्दे पर किसानों से 'मन की बात' कार्यक्रम में अपना पक्ष रखा। उन्होंने ये जताने की कोशिश की कि ये बिल किसानों के लिए कितना अहम है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सांसदों और नेताओं को भी अपने इलाके में इस पर किसानों को समझाने की बात कही है।

फिलहाल जमीन अधिग्रहण बिल के विरोध के पीछे कांग्रेस और दूसरे दलों के विरोध की कई वजहें हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मुताबिक साल 2013 में जिस जमीन बिल को लाने में यूपीए सरकार को दो साल लगे उसे मोदी सरकार क्यों बदलना चाहती है। वो भी तब जबकि इस बिल पर भाजपा नेताओं ने भी समर्थन किया था।

अब देखना होगा कि भूमि अधिग्रहण बिल, जिसे मोदी सरकार अपनी इज्जत का प्रश्न बना चुकी है उस पर उनकी आगे की रणनीति क्या होगी? क्या वाकई वो इस बिल को लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा से भी पास कराने में सफल हो पाएगी?

दिल्ली चुनाव: जब मोदी 'मैजिक' को लगा झटका

एक साल पहले जिस भारी बहुमत से मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में उससे यही लगा कि देश की जनता को उनसे काफी उम्मीदें हैं। हालांकि एक साल के भीतर ही मोदी सरकार की छवि पर उंगलियां उठने लगी। इसकी बानगी दिल्ली विधानसभा चुनावों में देखने को मिली।

जिस दिल्ली की जनता ने लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सभी 7 लोकसभा सीटों पर जिताया। उसी ने फरवरी 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को प्रदेश की 70 में से 67 सीटें दे दी। भाजपा को महज 3 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। ये चुनाव परिणाम कहीं न कहीं मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका था।

चुनाव से पहले भाजपा ने कई ऐसे दांव चले जिससे दिल्लीवासियों को अपने साथ जोड़ा जा सके। इसके लिए उन्होंने अन्ना की सहयोगी किरण बेदी को पार्टी में ले आई। इसके बाद भी भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में ही अपनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

लेकिन कहीं न कहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के 49 दिनों की सरकार का असर जनता पर ज्यादा दिखा। उन्होंने भाजपा की रणनीति पर विश्वास नहीं करते हुए केजरीवाल को दिल्ली की बागडोर सौंपी।

जिसके बाद देश ही नहीं बल्कि दुनिया में मोदी की साख पर उंगलियां उठी। अमेरिका के प्रमुख अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने दिल्ली चुनाव परिणाम पर टिप्पणी करते हुए इसे मोदी की हार करार दिया। उन्होंने अपने संपादकीय में पीएम मोदी की जमकर आलोचना की।

पाकिस्तान पर मोदी सरकार का दोतरफा रवैया

जब से प्रधानमंत्री मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं उनके रूख में पाकिस्तान को लेकर एक अजीब उलझन नजर आ रही है। कभी वो पाकिस्तान से सारे रिश्ते तोड़ने की बात करते हैं, वहीं कई बार पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते की पैरवी भी कर देते हैं।

लोकसभा चुनावों में उन्होंने शहीद हेमराज के सिर काटे जाने के पाकिस्तान की कार्रवाई की जमकर भर्त्सना की थी। उन्होंने पाकिस्तान को इसका मुंह तोड़ जवाब नहीं देने को लेकर तत्कालीन मनमोहन सरकार पर सवाल खड़े किए।

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी जैसे ही सत्ता में आए तो अपने शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को  न्यौता दे दिया। इसके बाद भी पाकिस्तान की ओर से लगातार जम्मू-कश्मीर में सीजफायर का उल्लंघन, आतंकी घुसपैठ की घटनाएं बढ़ती चली गई।

हालांकि इन विवादों के चलते भारत ने पाकिस्तान से राजनयिक संबंध तोड़ दिए। इस बीच मुंबई हमलों के सरगना और सबसे बड़े आतंकी हाफिज सईद को भी पाकिस्तान ने जेल रिहा कर दिया है। जिसका भारत ने विरोध जताया हालांकि इन घटनाओं के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी का सख्त रूख सामने आता नजर नहीं आया।

हालांकि इस बीच दोनों देशों के बीच बातचीत बंद हो गई। लेकिन एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी की ओर से पाकिस्तान सरकार की तरफ दोस्ती के हाथ बढ़े हैं। 12 मई को भाजपा सांसदों के साथ बैठक करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि पाकिस्तान से एक बार फिर से दोस्ताना संबंध उनकी सरकार के दौरान ही कायम हो जाएंगे।

फिलहाल ये तो भविष्य का सवाल है कि वो इसे कैसे अंतिम रूप देंगे। लेकिन अगर ऐसा होता है तो ये उनकी बड़ी उपलब्धि होगी।
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पत्नी के मामले पर मोदी सरकार की किरकिरी

लोकसभा चुनावों के दौरान पत्नी का नाम छुपाने को लेकर विवादों में आए नरेंद्र मोदी विरोधियों के निशाने पर आ गए थे। उस समय लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर नामांकन के समय उन्होंने फॉर्म में पत्नी का नाम जशोदाबेन लिखा था।

इसके पहले जब वो गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन करते थे तो उन्होंने पत्नी के नाम का कॉलम खाली रखा था। इसी मुद्दे पर वो विपक्ष के निशाने पर आ गए।

इसके बाद एक बार फिर विवाद सामने आया जब प्रधानमंत्री मोदी की पत्नी ने आरटीआई डालकर उन्होंने प्रधानमंत्री की पत्नी को मिलने वाली सुरक्षा कवर की जानकारी मांगी।

इस मुद्दे पर उन्हें सूचना नहीं मिलने पर करीब चार महीने बाद जशोदाबेन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत एक बार फिर से वही जानकारी मांगी।

पहले नवंबर 2014 में आरटीआई के जरिए उन्होंने मेहसाणा पुलिस से जानकारी मांगी थी कि उन्हें अभी प्रधानमंत्री की पत्नी की तौर पर कौन सी सुरक्षा मिली हुई है और वह किस सुरक्षा की हकदार हैं।
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