सिनेमा के पर्दे की तरह राजनीति में भी तस्वीर या सीन बदलने में देर नहीं लगती। जदयू का भाजपा से 17 साल पुराना नाता टूटते ही एकाएक 2014 की भावी सियासत का सीन भी फिलहाल कुछ इसी तरह बदलता दिख रहा है।
राजनीतिक तलाक की इस घटना से घोटालों, महंगाई और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर जार-जार दिख रही यूपीए सरकार की अगुवाई करने वाली कांग्रेस अचानक फ्रंटफुट पर आकर सियासी दांव चलने लगी है।
17 साल बाद एनडीए से जदयू हुआ अलग
दूसरी ओर ताजा राजनीतिक दृश्य से पहले अब तक फ्रंटफुट पर खेलती आ रही एनडीए की अगुवा भाजपा को नीतीश कुमार ने अचानक बैकफुट पर धकेल दिया है। यूपीए को परेशानी में घेरने वाले सभी मुद्दे राजनीतिक परिदृश्य से अचानक गायब दिखने लगे हैं।
अब तक घनघोर कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाला जदयू और कांग्रेस भविष्य के लिए एक दूसरे की ओर देख रहे हैं।
मोदी की वजह से टूटा गठबंधनः आडवाणी
जाहिर है कि कल तक परेशानी में घिरा यूपीए अब चैन की सांस ले रहा है। मिशन 2014 की लड़ाई में नरेंद्र मोदी के सहारे उम्मीदों के हौसले के साथ ही भाजपा और एनडीए के सामने कठिन चुनौतियों का पहाड़ दिख रहा है।
इस सियासी दृश्य का दिलचस्प पहलू यह रहा कि रविवार दोपहर बाद जब जदयू पटना में भाजपा से 17 साल की दोस्ती खत्म करने की घोषणा कर रहा था तो दिल्ली में कांग्रेस अपने संगठन को नया लुक दे रही थी। दोनों जगह की तस्वीर बता रही थी कि मिशन 2014 की सियासी पटकथा अचानक बदल गई है।
मोदी विरोध की इस सियासत से एक तरफ अब तक हांफती नजर आ रही कांग्रेस अचानक आत्मविश्वास से लबरेज होने का संदेश देने लगी है। तो दूसरी ओर भाजपा अचानक ही अंतर्विरोध का शिकार होकर चुनौतियों के जाल में घिर रही है।
सियासी जमीन पर समान विचारधारा वाले दलों का गठबंधन बन कर रह गए राजग और भाजपा के लिए अभी चुनौतियों की शुरुआत हुई है।
भले ही मोदी को मिली नई जिम्मेदारी से कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा हो। मगर यही नई जिम्मेदारी लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज सरीखे पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं की नाराजगी के साथ ही एनडीए में बिखराव का कारण बनती जा रही है।
कांग्रेस संगठन में हुए बदलाव पर किसी ने चूं तक नहीं की और न ही भविष्य में इसकी कोई गुंजाइश है। जबकि भाजपा ने मोदी को केवल चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपी तो झगड़ा न केवल पार्टी बल्कि एनडीए की नाराजगी को भी सड़कों पर ले आया।
फिलहाल जदयू की विदाई के बाद भी आडवाणी और सुषमा जैसे नेताओं की नाराजगी की चिंगारी के अंजाम तक पहुंचने का इंतजार हो रहा है।
जदयू के इस फैसले से गैरकांग्रेसवाद की जमीन पर कभी 24 दलों की अगुवाई करने वाला एनडीए का कुनबा बढ़ाने की तात्कालिक संभावनाओं को भी गहरा आघात लगा है।
क्योंकि वैचारिक प्रतिबद्धताओं को किनारा कर कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाली पार्टियों को एनडीए से जोड़ने में अहम भूमिका निभाने वाली जदयू खुद कांग्रेस विरोध की अपनी सियासत से पलटी मारने का संकेत दे रही है।
नरेंद्र मोदी को आम चुनाव में बड़ी चुनौती मान रही कांग्रेस और यूपीए को नीतीश कुमार के इस दांव ने फिलहाल बड़ी राहत तो दी है।
कांग्रेस का संदेश
दरअसल संगठन में आज के ही दिन बदलाव कर कांग्रेस ने यह संदेश दिया कि जहां एनडीए बिखराव की ओर जा रहा है। वहीं कांग्रेस पूरे आत्मविश्वास के साथ यूपीए तीन की सियासत की पटकथा लिखने की शुरुआत कर रही है।
चूंकि इस नई राजनीतिक परिस्थिति में मुद्दा मोदी समर्थन बनाम मोदी विरोध पर अटक गया है। इसलिए राजनीतिक परिदृश्य से यूपीए को परेशान करने वाले घपलों-घोटालों, महंगाई और जार-जार अर्थव्यवस्था सरीखे आम आदमी से जुड़े मुद्दे पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं।