जब स्क्वॉड्रन लीडर विलियम ग्रीन एक सफल अभियान के बाद अपने नैट लड़ाकू विमान के साथ पठानकोठ एयरबेस पर उतरे तो वो अच्छे मूड में थे। लेकिन उनकी ख़ुशी उस समय काफूर हो गई जब उन्हें पता चला कि उनका एक साथी ब्रजपाल सिंह सिकंद वापस नहीं लौट पाया है। उस जमाने में अधिक्तर जहाजों में जीपीएस सिस्टम या रडार नहीं होते थे।
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पायलट्स बेस पर वापस आने के लिए नक्शों या कंपास का इस्तेमाल करते थे। सिंकद अपने फारमेशन से बिछड़ गए थे। उनके पास ईंधन कम था। उनको ऊपर से एक हवाई स्ट्रिप दिखाई दी और वो उस पर ये समझ कर लैंड कर गए कि वो एक बियाबान भारतीय स्ट्रिप है। सिकंद यह जान कर भौचक्के रह गए कि पाकिस्तान के पसरूर हवाई पट्टी पर उतर गए हैं। उन्हें तुरंत युद्धबंदी बना लिया गया।
उधर इस सबसे अनजान जब पठानकोट एयरबेस पर सिकंद नहीं पहुंचे तो उनकी तलाश में दो वैंपायर जहाज भेजे गए। वो ऊपर से सिकंद के विमान का मलबा ढ़ूंढ़ने की कोशिश करते रहे जिसके बारे में अनुमान लगाया जाने लगा था कि वो दुर्घटनाग्रस्त हो गया है।
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वो सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते थे कि सिकंद का नैट सीमा पार पाकिस्तान में पसरूर पर उतर चुका है।
उतरने को मजबूर किया गया
बीएस सिकंद इसी विमान को उड़ाकर पाकिस्तान एयरपोर्ट पर उतरे थे। फील्ड मार्शल अयूब के बेटे गौहर अयूब ख़ाँ ने बीबीसी के बताया कि सिकंद का नैट ग़लती से पसरूर में नहीं उतरा बल्कि उसे पाकिस्तान के एक स्टार फाइटर विमान ने जबरदस्ती पसरूर में उतरने पर मजबूर कर दिया।
गौहर अयूब ने बताया, "उस विमान को मेरे बैचमेट हकीमउल्लाह उड़ा रहे थे। हकीमउल्लाह बाद में पाकिस्तानी वायु सेनाध्यक्ष बने। उन्होंने जब सिकंद के विमान को पाकिस्तानी क्षेत्र में उड़ते हुए देखा तो उन्होंने उसे संदेश भेजा कि वो नीचे की पट्टी पर अपना विमान उतारें नहीं तो वो उसे उड़ा देंगे।" सिकंद को युद्धबंदी बनाने के बाद फ्लाइट लेफ्टिनेंट साद हातमी उस नैट को उड़ा कर पेशावर एयर बेस ले गए। उन्हें ब्रिटेन में अपनी ट्रेनिंग के दौरान नैट उड़ाने का अनुभव था।
पाकिस्तान के उड्डयन इतिहासकार कैसर तुफैल बताते हैं, "सिकंद ने पूछताछ के दौरान सवाल पूछने वालों को बताया कि उनके विमान में एक साथ कई ख़राबियाँ हो गईं थीं। मैंने भी युद्धक विमान उड़ाए हैं और मैं तर्जुबे के साथ कह सकता हूँ कि किसी विमान में एक साथ इतनी गड़बड़ियाँ नहीं हो सकती।"
दोबारा उड़ान भरने की कोशिश
बीबीसी ने इस मामले पर सिकंद की टिप्पणी लेनी चाही तो उन्होंने ये बता कर बातचीत करने से मना कर दिया कि अब वो काफी वृद्ध हो चले हैं। सिकंद ने कुछ अख़बारों में लेख लिख कर ये बताने की कोशिश की कि वो गलती से पसरूर में उतरे थे और इसका अहसास होने पर उन्होंने दोबारा टेक आफ करने की कोशिश की थी।
इसके जवाब में कैसर तुफैल कहते हैं, "लैंड करने के बाद एक जेट फाइटर तुरंत टेक ऑफ नहीं कर सकता। उन्होंने तो अपना इंजिन स्विच आफ कर दिया था और उस समय वो स्ट्रिप के बिल्कुल अंत तक पहुंच चुके थे जहाँ से दोबारा टेक ऑफ करना असंभव था।" हकीमउल्लाह के होने के सबूत नहीं लेकिन सिकंद के समर्थन में पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा अपनी किताब, द इंडिया पाकिस्तान एयर वार आफ 1965 में लिखते हैं, "हकीमउल्लाह उस इलाके में भले ही उड़ रहे हों जहाँ ये नैट उतरा था, लेकिन पाकिस्तानी सूत्रों के अलावा इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि नैट को जबरदस्ती पसरूर पर उतरवाया गया।"
कैसर तुफैल ने एक दूसरे लेख में स्वीकार किया है कि हकीमउल्लाह ने तब तक नैट को नहीं देखा था जब तक उन्होंने उसे पसरूर स्ट्रिप पर अपने ब्रेक शूट के साथ खड़े पाया। इस पूरे प्रकरण के एक और गवाह थे अमृतसर रडार स्टेशन के विंग कमांडर दंडपानी। उन्होंने जगनमोहन को बताया कि उनको उसी समय पता चल गया था जब सिकंद का विमान अपने मुख्य फारमेशन से अलग हुआ था, लेकिन फिर वो उनकी रडार की स्क्रीन से ग़ायब हो गया था।
पक्षी टकराने से विमान का नुकसान
दंडपानी जोर दे कर कहते हैं कि उस समय उन्हें रडार पर उस इलाके में कोई पाकिस्तानी विमान नहीं दिखाई दिया था। ये ख़बर आने के बाद कि एक नैट पाकिस्तान में साबुत उतार लिया गया है, पठानकोट एयर बेस के सारे नैट्स को ग्राउंड करके उनके रेडियो क्रिस्टल को बदला गया ताकि पाकिस्तानी भारतीय वायु सेना की फ्रीक्वेंसियों को डिसाइफर कर उन्हें सुन न सकें।
गौहर अयूब ख़ाँ ने एक और दिलचस्प बात बताई कि इस नैट को बाद में पाकिस्तानी वायु सेना के प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया गया। इस बीच इस विमान से एक पक्षी टकरा गया जिससे इसकी केनोपी को काफी नुकसान पहुंचा। 'उस समय यूगोस्लाविया की वायु सेना में काफी नैट हुआ करते थे। हमने वहाँ से इसकी केनोपी मंगवाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हमारा भाग्य अच्छा था कि इंग्लैंड में एक पेट्रोल पंप पर वहाँ तैनात पाकिस्तानी एयर अटैशे की मुलाकात एक अंग्रेज से हुई।'
वो अंग्रेज भारत की हिंदुस्तान एयरनाटिक्स फैक्ट्री में काम कर चुका था। गौहर अयूब ख़ां के मुताबिक, "जब हमारे एयर एटेशे ने उसे बताया कि हम नैट की कनोपी की तलाश में हैं तो उसने कहा कि इसको हासिल करना कोई बड़ी समस्या नहीं होगी।"
उस अंग्रेज की बदौलत उस केनोपी को बंगलौर फैक्ट्री से बाहर ला कर गुप्त रूप से पाकिस्तान भेजा गया और नैट को दोबारा उड़ने योग्य बनाया गया। आज भी ये नेट पाकिस्तानी वायु सेना के म्यूजियम में रखा हुआ है।