काम के बोझ के मारे लोको पायलटों (ड्राइवरों) के जीवन को दुख भरे दिनों से अच्छे दिनों में लाने की याद आखिरकार रेल मंत्रालय को आ गई है।
पायलटों के दुख दूर कर रेल मंत्रालय मानवीय भूल के चलते सिग्नल तोड़ने (स्पैड) से होने वाली रेल दुर्घटनाओं पर भी विराम लगाना चाहता है। मंत्रालय ने पायलटों की तकलीफों को सुनने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी गठित की है।
यह कमेटी स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे पायलटों से बात कर अपने सुझावों की रिपोर्ट एक माह के अंदर रेल मंत्रालय को सौंपेगी।
17000 पायलटों के पद है खाली
खास बात यह है कि मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि कमेटी जो भी रिपोर्ट देगी उसे लागू कर पायलटों को राहत प्रदान की जाएगी। रेलवे में लोको पायलटों की भारी कमी है।
पूरे देश में ट्रेनों का जाल बिछा हुआ है, लेकिन पायलटों की कमी के चलते उन पर अतिरिक्त भार डाला गया है। इसी भार के चलते ड्राइवरों से मानवीय भूलें हो रही हैं, जिससे छोटी और बड़ी दुर्घटनाएं हो रही हैं।
आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त रेलवे में 17 हजार से अधिक पायलटों के पद खाली पड़े हैं। रेलवे के पास इस वक्त तकरीबन 45 हजार ही पायलट हैं।
तो कम होंगे हादसे
पायलटों की मांगों पर कई बैठकें हुईं। उन्हें सुना भी गया, लेकिन न तो रेल बुक के नियमों को बदला जा सका और न ही ड्राइवरों को राहत मिल पाई। इंडियन रेलवे लोको रनिंगमेन आर्गेनाइजेशन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का सहारा लेना पड़ा। यह मानवाधिकार आयोग ही है, जिसने आर्गेनाइजेशन के अंतर्गत आने वाले रेलवे के सेफ्टी स्टाफ की शिकायतों को सुनने के निर्देश रेल मंत्रालय को दिए।