अपने शानदार कैरियर में दिलीप कुमार ने एक से बढ़ कर एक रोल निभाए। चाहे वे ट्रेजडी के हों या फिर कॉमेडी के। उन्हें मुगल राजकुमार सलीम के रूप में भी उतना प्यार मिला, जितना गांव के गोपी के रूप में।
शानदार हीरो के रोल निभाने वाले दिलीप ने फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं भी निभाईं। 'फुटपाथ', 'अमर', 'विधाता', 'मशाल' और 'इज्जतदार' ऐसी ही फिल्में हैं। लेकिन इन फिल्मों एक ऐसा भी रोल था, जिसमें दिलीप कुमार रेपिस्ट बने थे। लेकिन दर्शकों ने उन्हें इस किरदार में स्वीकार नहीं किया और पूरी तरह से नकार दिया।
यह फिल्म थी, अमर। 1954 में आई इस फिल्म का निर्देशन महबूब खान ने किया था। जिन्होंने आगे जाकर ‘मदर इंडिया’ (1957) जैसी फिल्म बनाई, जो हिंदी फिल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जाती है।
‘अमर’ में दिलीप कुमार ने अमरनाथ नाम के कामयाब वकील का किरदार निभाया। अमरनाथ के पिता उसकी शादी एक जज की बेटी (मधुबाला) के साथ तय कर चुके हैं।
उधर, अमर के गांव में रहने वाली एक ग्वालन है सोनिया (निम्मी)। सोनिया की मां सौतेली है और पिता अपाहिज। गांव का गुंडा (जयंत) उस पर मरता है। उससे शादी करना चाहता है। लेकिन सोनिया अपनी धुन में रहती है। जंगल से गुजरते हुए उसकी मुलाकात अमर से होती है और वह उसे मन ही मन चाहने लगती है।
आगे कहानी में ऐसा मुकाम आता है, जब जयंत के शादी के दबाव से घर से भागी सोनिया बरसात से बचने के लिए अमर के घर में पनाह लेती है। उसे देख कर अमर का अपने दिल पर काबू नहीं रहता। इस तूफानी रात में एक ऐसा क्षण आता है जब अमर का व्यक्तित्व कमजोर पड़ जाता है और वह सोनिया के साथ जबर्दस्ती कर बैठता है।
सोनिया भागती है। वक्त बीतता है और सोनिया गर्भवती हो जाती है...। इस बीच अमर अपनी होने वाली पत्नी को सब कुछ बताना चाहता है, लेकिन नहीं बता पाता। वह मन ही मन घुलता है। जयंत को सोनिया को गर्भवती बनाने वाला पता चल जाता है और वह उसकी हत्या करने निकल पड़ता है।
जंगल में वह अमर को मारने ही वाला होता है कि सोनिया उसे रोकती है। अमर-जयंत के संघर्ष में चाकू जयंत को लग जाता है। अमर भागता है और सोनिया वह चाकू अपने हाथ में ले लेती है।
गांव वाले समझते हैं सोनिया ने जयंत को मारा। अदालत में केस चलता है। अमर सोनिया का मुकदमा लड़ता है और उसे बचा लेता है। लेकिन उसे समझ आता है कि सोनिया को बचा कर भी वह उसे जिंदगी नहीं दे रहा। अंततः वह अपना पाप स्वीकार कर लेता है और सोनिया को अपनाता है।
यह दिलीप कुमार के उन दिनों की फिल्म है, जब वे ट्रेजिक रोल कर रहे थे। लेकिन दर्शकों को उनका यह रोल पसंद नहीं आया। फिल्म फ्लॉप हो गई। हालांकि इस फिल्म का एक गाना ‘भगवान का मंदिर है ये इंसाफ का घर है...’ आज भी सुना जाता है।
मधुबाला की मौजूदगी में भी निम्मी इस फिल्म की वास्तविक नायिका थी। उनके घुंघराले बाल और उनींदी आंखें दर्शकों को खूब पसंद थीं। दिलीप कुमार और निम्मी ने अपने कैरियर में चार फिल्म साथ-साथ की।
महबूब इस फिल्म में मीना कुमारी को लेना चाहते थे। वह चाहते थे कि मीना कुमारी मधुबाला वाला रोल करें। परंतु मीना कुमारी निम्मी की जगह लेना चाहती थीं।