'चोर मचाए शोर' की कामयाबी के बाद निर्माता एनएन सिप्पी ने फकीरा (1976) में एक बार फिर शशि कपूर को लिया। इस फिल्म में भाई की भूमिका के लिए कलाकार की तलाश शुरू हो गई।
जब मनमुताबिक कलाकार नहीं मिला तो सिप्पी ने डैनी डेंग्जोप्पा को एप्रोच किया। डैनी के साथ शशि 'चोर मचाए शोर' में काम कर चुके थे। डैनी को जब पता चला कि उन्हें शशि कपूर के भाई की भूमिका निभाना है तो वे हंस-हंस कर लोटपोट हो गए।
फिल्म के निर्देशक सीपी दीक्षित को उन्होंने कहा कि क्या दर्शक बेवकूफ हैं? क्या वे शशि कपूर और डैनी को भाई के रूप में स्वीकारेंगे? दोनों की शक्ल कितनी जुदा है? निश्चित रूप से फिल्म फ्लॉप हो जाएगी? सीपी दीक्षित नहीं माने तो डैनी ने सोचा अपना क्या जाता है और उन्होंने फिल्म कर ली।
इसी फिल्म के क्लाइमेक्स में डैनी को रोना था। डैनी को लगा कि सीन कुछ ज्यादा ही ड्रामेटिक हो रहा है और उन्होंने निर्देशक के काम में टांग अड़ाते हुए कहा कि इतनी भावुकता को दर्शक बर्दाश्त नहीं करेंगे इसलिए वे रोने वाला सीन नहीं करेंगे।
निर्देशक ने डैनी को समझाया, लेकिन वे नहीं माने। शशि कपूर उस समय बहुत व्यस्त कलाकार थे। उनका समय बरबाद हो रहा था। उन्होंने डैनी को पास बुलाकर डांट लगाई कि तुम्हें रोने के लिए पैसे मिल रहे हैं और तुम्हें रोना पड़ेगा।
निर्देशक का कहना मानना पड़ेगा। शशि जैसे कलाकार के आगे भला डैनी की कैसे चलती। फौरन उन्होंने सीन कर दिया।
डैनी के काम आई शशि की सलाह
फकीरा रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने जबरदस्त कामयाबी हासिल की। इससे डैनी ने सबक सीखे। उन्हें लगा कि दर्शक उन्हें और शशि कपूर को भाई के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन किसी भी दर्शक ने इस पर आपत्ति नहीं ली बल्कि उन्हें तो डैनी और शशि की जोड़ी अच्छी लगी।
उन्होंने यह सबक सीखा कि जरूरी नहीं है कि जिस पर खुद को आपत्ति हो दर्शकों को भी वह बात पसंद नहीं आए। दूसरा सबक उन्होंने यह सीखा कि निर्देशक से तर्क-वितर्क करने के बजाय जैसा कहा जाए वैसा किया जाना चाहिए।
जिस इमोशन सीन को करने से वे मना कर रहे थे, उस सीन को देख दर्शक सिनेमाहॉल में आंसू बहा रहे थे। इसके बाद डैनी ने कभी भी निर्देशक के काम में दखल नहीं दिया।