जिंदगी के पन्नों की तरतीब बदल कर कैसे कहानी बुनी जा सकती है, मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ इसका बढ़िया उदाहरण है। निर्देशक शोनाली बोस और उसकी फुफेरी बहन मालिनी छिब की जिंदगियों के अलग-अलग कलेवरों को लेकर यह कहानी तैयार की गई है।
मालिनी सेरेब्रल प्लेसी से पीड़ित हैं और जीवन व्हीलचेयर पर गुजार रही हैं। मांस-पेशियों से संबंधित इस बीमारी में मस्तिष्क शरीर के विभिन्न अंगों तक त्वरित संदेश नहीं पहुंचता, परंतु इससे व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक क्षमताओं पर कोई असर नहीं पड़ता।
वे सामान्य होती हैं। यही कारण है कि मालिनी दो विषयों में एमए हैं और उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है।
पर क्या फिल्म से न्याय करती है यह कहानी?
लेकिन क्या सिर्फ यह बातें फिल्म की कहानी के लिए पर्याप्त हैं? शोनाली ने इस कहानी में अपने जीवन के निजी प्रसंगों को जोड़ा है। वह खुद को बाई-सेक्सुअल बताती हैं।
इस तरह से मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ की कहानी ऐसी किशोरवय युवती का जीवन हमारे सामने लाती है, जो सेरेब्रल प्लेसी की शिकार है और अपनी यौन इच्छाओं का दमन नहीं करती। उसे लड़के हैंडसम लगते हैं और हमउम्र लड़की से भी उसे प्यार हो जाता है।
कहानी में है ताजगी का एहसास
कहानी के स्तर पर आप मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ को मौलिक और ताजगी भरा पाएंगे। नाम इसका अंग्रेजी में है, मगर फिल्म हिंदी में है। वैसे हिंदी पट्टी के अनेक दर्शकों के लिए इस विषय पर सहज बने रहना मुश्किल है।
फिर भी कहना होगा कि शोनाली ने कहानी को संवेदनशील और खूबसूरत ढंग से कहा है। लैला (कल्कि केकला) शारीरिक अपंगता के बावजूद एक सामान्य लड़की है। कॉलेज जाती है।
गाने सुनती है। संगीत रचती है। दोस्तों के साथ वक्त बिताती है। उसका दिल धड़कता है। सेक्स को लेकर वह जिज्ञासु है और पोर्न भी देखती है। जब न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की स्कॉलरशिप मिलती है तो लैला वहां जाती है।
न्यूयॉर्क में उसकी मुलाकात नेत्रहीन खानुम (शोयानी गुप्ता) से होती है। खानुम ‘लेेस्बियन’ है और 14 साल की उम्र में वह यह बात जान गई थी। लैला और खानुम की दोस्ती प्यार की राहों तक जाती है। परंतु कहानी में यहां ट्विस्ट आता है।
कलाकारों का अभिनय शानदार
भारत में समलैंगिकता अपराध है। परंतु सिनेमा तमाम अपराधों को पर्दे पर रचता आया है। वैसे लैला और खानुम के दृश्यों को निर्देशक ने अमेरिकी समाज में रचा है।
फिल्म का एक बेहद सुंदर पक्ष मां-बेटी के संबंध हैं। कल्कि और रेवती के ये दृश्य जीवंत और मन को छूने वाले हैं। शुरू से अंत तक फिल्म पर शोलानी की रचनात्मक छाप है। हालांकि कुछ बातें खटकती हैं।
इस फिल्म को याद रखने का एक बड़ा कारण कल्कि का अभिनय है। पिछले साल आपने क्वीन में कंगना रनौत को देखा था, इस साल कल्कि को देखिए। उन्होंने अभिनय के आकाश को कुछ और विस्तार दिया है।
अपनी प्रतिभा के बल पर वह सहजता-सादगी के साथ ग्लैमर बालाओं को पीछे छोड़ देती हैं। रेवती और शोयानी गुप्ता भी अपनी भूमिकाओं में खरी हैं। प्रसून जोशी के गीत अच्छे हैं। मार्गरीटा आपको सिनेमा की नई दुनिया में ले जाती है।
--