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'ओएमजी' की कहानी ने मेरी आंखें खोल दीं: अक्षय

Thu, 27 Sep 2012 12:49 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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अक्षय कुमार के लिए यह महीना दोहरी खुशी लेकर आया है। एक तरफ 25 सितंबर को ट्विंकल खन्ना ने एक बच्ची को जन्म दिया, यानी वे दूसरी बार पापा बने। वहीं उनके होम प्रोडक्शन की फिल्म 'ओएमजी' इसी हफ्ते रिलीज हो रही है। हमने अक्षय से बात की तो उन्होंने न सिर्फ अपनी खुशियां शेयर कीं, बल्कि यह भी बताया कि ओएमजी उनके लिए क्यों एक अहम फिल्म है।
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अक्षय, सबसे पहले आपको बहुत-बहुत बधाई कि आप फिर से पापा बन गये हैं। कैसा है यह अनुभव?
जी बहुत बहुत शुक्रिया। मैं बेहद खुश हूं कि मेरी बेटी का जन्म भी सितंबर में ही हुआ है और मेरा जन्म भी सितंबर में रहा है। और मेरी फिल्म 'ओह माइ गॉड' भी सितंबर में ही रिलीज हो रही है।

तो मैं सितंबर को अब बेहद लकी मानने लगा हूं। मैं खुश हूं कि टिवंकल और बेबी दोनों सही हैं। बेटी ट्विंकल और अपनी नानी की तरह ही बेहद खूबसूरत है। मैं शुक्रगुजार हूं ईश्वर का कि उन्होंने मेरा दामन खुशियों से भर दिया है। वाकई यह गणोश चतुर्थी मेरे लिए खुशियों की सौगात लेकर आया है।
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क्या गणेश चतुर्थी को ध्यान में रखते हुए ही आपने फिल्म 'ओह माइ गॉड' की रिलीज डेट तय की थी?
जी, यह सच है कि गणोश चतुर्थी को ध्यान में रखते हुए रिलीज की तारीख तय की गयी थी। लेकिन इसलिए नहीं कि हमें इसका फायदा होगा। बल्कि इसलिए कि मैं गणेश चतुर्थी को बहुत शुभ मानता हूं। मैं घर पर खुद गणेश जी की पूजा करता हूं। तो अच्छे काम की शुरुआत अच्छे वक्त हो, बस यही इच्छा थी। और मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि यह फिल्म मैंने पैसे बनाने के लिए, नहीं बनाई है।

'ओएमजी' नाम चुनने की कोई खास वजह?
देखिए यह फिल्म गुजराती प्ले 'कांजी विरुद्ध कांजी' पर आधारित है। फिल्म में भगवान की अहम भूमिका है। भगवान व आम इंसान के बीच के संवाद हैं। प्राय: आम तौर पर भी हम जब कुछ अच्छा होता है तो थैंक गॉड या कुछ आश्चर्यजनक होता है तो ओह माय गॉड बोलते हैं तो बस फिल्म की थीम को ध्यान में रखते हुए यही नाम रख दिया गया है।

परेश को इस फिल्म के लिए चुनने की खास वजह?
इस फिल्म की कहानी ने मेरी आंखें खोल दीं। परेश और मैं पिछले कई सालों से एक साथ काम कर रहे हैं और परेश फिल्म इंडस्ट्री में मेरे अच्छे दोस्तों में से एक हैं। दरअसल, परेश की वजह से ही मैंने यह प्ले देखा था। प्ले देखने के बाद मुझे जिंदगी को देखने का एक नया नजरिया मिला।

इस प्ले को देखने के बाद मैंने बस यही महसूस किया था कि हम अंधविश्वासी होकर धर्म के नाम पर कुछ भी करते हैं और धर्म के संरक्षक माने जानेवाले लोगों की बातों में आकर भी कुछ भी करते हैं।ऐसे में इस प्ले ने मुझे सिखाया कि अगर बस अच्छा काम कर दो तो ईश्वर यूं ही मिल जाते हैं। आपकी बरक्कत होने लगती है।

मेरे लिए यह प्ले आइ ओपनर था। इस प्ले को देखने के बाद मैंने वैष्णो देवी जाना छोड़ दिया। अब जो खर्च वहां जाने में करता था। अब गरीबों को दान करता हूं। उससे ही पुण्य मिलता है। सो, मैंने परेश से बात की कि इस पर फिल्म बनाते हैं। ताकि जिस तरह मेरी आंखें खुली। और लोग भी जानें।

लेकिन ऐसी फिल्में क्या आज प्रासंगिक है?
हां, क्यों नहीं है। बल्कि मुझे लगता है कि कई सालों पहले ऐसी फिल्म बन जानी चाहिए थी। हमारा इस फिल्म से यह मकसद नहीं कि हम किसी धर्म को ठेस पहुंचाएं। किसी की आस्था का अपमान करें। बस हमारी यह कोशिश है कि हम कुछ भी करते हैं तो समझें कि क्यों करते हैं।

आंखें मूंदकर किसी पर विश्वास करना धोखा है। फिर चाहे वह इंसान हो या पत्थर। परेश एक बेहतरीन बात बोलते हैं कि अगर आप पत्थर की पूजा कर रहे हैं और इंसान जिसमें जान है- उसके साथ बुरा बर्ताव कर रहे हो तो कभी आप खुश नहीं रह सकते।

लेकिन अक्षय, आप सुपरस्टार हैं। ऐसी फिल्म जिसमें आप भगवान बन कर आते हैं- एक सुपरस्टार के पर्सोना से क्या मेल खाता है। थोड़ा हास्यपद नहीं लगता?
मैंने पहले ही कहा कि मैं यह फिल्म अपनी खुशी के लिए बना रहा हूं। आप जब खुद देखेंगे फिल्म। तो आप महसूस करेंगे कि कितनी परतों में चीजें सामने आ रही हैं। और हास्यपद क्यों? मैंने कोई खून तो नहीं कर रहा है। एक किरदार है। वह निभा रहा हूं। क्यों? इस तरह तो अमित जी को भी 'गॉड तुसी ग्रेट' हो में भगवान का किरदार नहीं निभाना चाहिए था। हम कलाकार हैं। और जो किरदार मिलेगा। करेंगे।

इस फिल्म के भगवान बाइक पर क्यों आ रहे हैं?
क्योंकि इस फिल्म में हमने यही दिखाने की कोशिश की है कि भगवान हर आम आदमी के अंदर है और उसके लिए किसी बनावटीपन की जरूरत नहीं। तो बाइक से आम आदमी रिलेट कर पायेंगे कि भगवान उनके बीच ही कोई है। सो, यह कांसेप्ट चुना हमने।

आपने इससे पहले भी 'एक्शन रिप्ले', 'वक्त' जैसी प्ले पर आधारित फिल्में की है? क्या आपको प्ले में दिलचस्पी है या फिर आपको ऐसे किरदार आकर्षित करते हैं?
सच्चाई से कहूं तो मैं प्ले पढ़ता नहीं। न ही बहुत जानता हूं। हां, इंडस्ट्री में कुछ परेश जैसे दोस्त हैं। जो काफी प्ले से करते हैं तो उनसे जानकारी मिलती रहती है। जहां तक बात 'एक्शन रिप्ले', 'वक्त' जैसी फिल्मों का है। मैं यह कहूंगा कि हां, प्ले के किरदार बहुत लेयरड होते हैं। प्ले में हर किरदारों के भाग को बेहतरीन तरीके से डिटेलिंग में लिखा जाता है। ऐसे किरदारों में बारीकी होती है। वेरियेशन होता है तो काम करने में मजा आता है।

इस फिल्म में 'गो गो गोविंदा...' गाने में सोनाक्षी को लेने की कोई खास वजह? फिल्म तो अभी रिलीज हो रही है। लेकिन आपने गाना जन्माष्टमी के वक्त ही रिलीज कर दिया था?
हां, बिल्कुल यह हमारे प्रमोशनल इवेंट का हिस्सा था। गाना गोविंदा पर था तो जन्माष्टमी से बेहतर वक्त और क्या हो सकता था। दूसरी बात यह है कि सोनाक्षी को मैं अपने लिए लकी मानता हूं। वो अच्छी दोस्त हैं और उन्होंने 'गो गो...' में बेहतरीन डांस किया है। सो, बस इसी वजह से उन्हें शामिल किया।

हमने सुना आपने फिल्म के लिए खुद को वेजीटेरियन बना लिया है?
हां, टिवंकल की इच्छा थी कि फिल्म की रिलीज तक और गणपति उत्सव तक मैं नॉन वेज न खाऊं। तो उनका हुक्म सर आंखों पर।

आपकी आनेवाली फिल्मों के बारे में बताएं?
फिलहाल 'वन्स अपन अ टाइम' इन मुंबई के सीक्वल की शूटिंग चल रही है। कुछ दिनों के ब्रेक के बाद फिर से शूटिंग पर लौटना है। यह फिल्म मेरे लिए बेहद खास रहेगी। चूंकि काफी दिनों के बाद कुछ अलग सा किरदार निभा रहा हूं। फिल्म ईद पर रिलीज होगी। यह मेरी पहली फिल्म होगी जो ईद के दौरान रिलीज होगी। इसके अलावा 'खिलाड़ी 786' कर रहा हूं। संजय लीला के साथ दोबारा एक प्रोजक्ट कर सकता हूं।

आप बॉलीवुड में सबसे ज्यादा व्यस्त रहनेवाले सुपरस्टार हैं। तो परिवार के लिए वक्त निकालना कितना कठिन होगा अब जबकि घर में एक और नया सदस्य आया है?
तो अच्छा है न। काम मिलते रहना चाहिए। वरना यहां कब पासा पलट जाये पता नहीं चलता। आज है काम कल नहीं। बॉलीवुड में स्टारडम स्थाई नहीं है।जहां तक परिवार की बात है तो सभी जानते हैं कि मेरे लिए परिवार बेहद महत्वपूर्ण है। मैं अपने नये सदस्य को शिकायत का मौका नहीं दूंगा। वक्त निकालने की कोशिश करूंगा ही और काम भी करता रहूंगा। ज्यादा से ज्यादा चूंकि अब तो जिम्मेदारियां बढ़ गयी हैं।

अक्षय, आपके बारे में हमेशा आपके को-स्टार्स की सिर्फ एक शिकायत रहती है कि आपकी वजह से उन्हें मजबूरन सुबह उठ कर काम करना पड़ता है। शूटिंग करनी पड़ती है?
तो इसमें बुराई क्या है। रात तो सोने के लिए ही होता है। मैं तो आज से नहीं बचपन से ही चार बजे उठ जाया करता था। पापा के साथ कई किमी दूर तक साइकिल चला कर स्कूल जाता था। बचपन की आदत है जल्दी सोने की। शाम में जल्दी सो जाने की और आज भी ये बरकरार है। मैं इसके कारण ही आज फिट हूं और ज्यादा काम कर पाता हूं। थकता नहीं हूं... मैं अपना रुटीन नहीं बदल सकता।
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