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हमारे यहां रंग को लेकर हीन भावना है बरकरार: नंदिता

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गोरे रंग को लेकर भारतीयों की हीन भावना या चाहत जदयू नेता शरद यादव के बयान के बाद से चर्चा के केंद्र में है। हिंदी फिल्म अदाकारा नंदिता दास उन बेहद कम लोगों में से हैं जिन्होंने इसे लेकर खुलकर आवाज उठाई है।
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बीबीसी संवाददाता इकबाल अहमद से बातचीत में नंदिता दास ने बचपन में सांवलेपन को लेकर कही गई बातों और भारतीय मानसिकता पर बात की है। क्या कहती हैं नंदिता दास।

खूबसूरती का खांचा
"साल 2009 से रंग भेद पर एक अभियान जारी है, 'डार्क इज ब्यूटीफ़ुल'। लेकिन 2013 में वीमेन ऑफ़ वर्थ नाम की एक स्वंयसेवी संस्था की कविता इमैनुअल ने मुझसे कहा कि मैं इस अभियान का समर्थन करूं।
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मैं सामान्यत: ऐसी चीजों का समर्थन नहीं करती जिनसे मैं बहुत ज्यादा जुड़ी नहीं होती। लेकिन कई बार महसूस होता है कि अगर कुछ अच्छा हो रहा है तो हमें कम से कम उसका समर्थन तो करना ही चाहिए।

मैंने ऐसा किया तो वो बात खूब फैली, वायरल हो गई। इतने लोगों ने उसके बारे में लिखा कि मुझे लगा कि यह मुद्दा अलग से भी उठाया जा सकता है। मैंने पहले इसके बारे में नहीं सोचा था।
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मैं खूद सांवली हूं

चूंकि मैं खूद सांवली हूं। और आप जब खुद सांवले होते हैं तो आपको बचपन से ही कोई न कोई याद दिलाता रहता है कि आपका रंग औरों से कुछ कम है। या आपसे कहा जाता है कि धूप में मत जाइए या यह क्रीम ले लीजिए।

हम जानते हैं कि सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं बहुत से मुल्कों में, कम से कम दक्षिण एशिया में रंग को लेकर हीन भावना है।

जब मैंने उस अभियान का समर्थन किया तो कई किशोर लड़कियों को लगा कि चलो कोई तो हमारे बारे में बात कर रहा है।

क्योंकि जितनी फिल्में हैं, जितने विज्ञापन हैं, जितनी ब्यूटी मैग़जीन्स हैं और टीवी सीरियल हैं, सब आपको किसी न किसी तरह से कहते रहते हैं कि आप पर्याप्त सुंदर नहीं हैं।

खूबसूरती की जो परिभाषा गढ़ी गई है अगर आप उसमें फिट नहीं हो रहे, तो फिर आपका कोई काम नहीं है।"
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