अमर अकबर एंथोनी फिल्म बनने का किस्सा बहुत ही दिलचस्प है। इसके बनने में भी फिल्म जैसे ही मोड़ हैं। अगर फिल्मी दुनिया के लोग कहते हैं कि हम पर्दे पर वही दिखाते हैं जो इस दुनिया में घटता है तो कुछ गलत भी नहीं है।
अनेक घटनाएं और उनकी खबरें कहानियों, उपन्यासों और फिल्मों को जन्म देती रही हैं।
1977 में आई मसाला क्लासिक 'अमर अकबर एंथोनी' का आइडिया भी इसके डायरेक्टर मनमोहन देसाई को एक सुबह अखबार में छपी खबर से ही आया था।
उन्होंने खबर पढ़ी कि एक व्यक्ति अपने तीन बेटों को साथ लेकर पार्क में आया और उन्हें वहां छोड़ कर उसने आत्महत्या कर ली। देसाई इस पर दिन भर सोचते रहे।
शाम को उनकी मुलाकात अपने राइटर प्रयाग राज से हुई। देसाई ने उन्हें खबर बताई और कहा, 'सोचो कि उस आदमी ने आत्महत्या नहीं की और जब लौट कर पार्क में आया तो देखा कि उसके तीनों बेटे वहां नहीं हैं। अब वह कैसे रिएक्ट करेगा?'
देसाई के साथ कई फिल्मों में काम कर चुके प्रयाग राज ने इस आइडियो को विकसित किया। बोले, 'क्या हो अगर बच्चों को तीन अलग-अलग लोग वहां से ले गए।
एक को हिंदू, एक को मुस्लिम और एक को ईसाई। इस तरह से तीन भाईयों के बिछुड़ने की इस क्लासिक कहानी ने आकार लेना शुरू किया।
प्रयाग राज उस शाम देसाई के घर उनके फार्म हाउस की चाबी मांगने आए थे कि वहां जाकर आराम करेंगे। लेकिन बातों को सिलसिला ऐसा चला कि आधी रात गुजर गई।
राज ने अपने इरादे बदल दिए और घर लौट गए। अगले दिन दोनों फिर मिले और कहानी को आगे बढ़ाया। मनमोहन देसाई के बेटे केतन के अनुसार उनकी मां ने भी इस कहानी में कुछ महत्वपूर्ण आइडिये दिए थे, इसलिए पर्दे पर 'स्टोरी' में उन्हें श्रेय दिया गया है।
जब मनमोहन देसाई और प्रयाग राज कहानी को विकसित कर रहे थे तो राज ने कहा कि मैं इस कहानी को अपने ढंग से मांज कर चमका सकता हूं बशर्ते आप इस फिल्म के प्रोड्यूसर बनें।
आपने कई प्रोड्यूसरों की झोली पैसों से भर दी है। अब समय है कि अपनी आर्थिक हालत को मजबूत बनाएं। काफी विचार विमर्श के बाद मनमोहन देसाई तैयार हो गए।
(साभारः हार्पर कॉलिंस इंडिया द्वारा प्रकाशित सिद्धार्थ भाटिया की ‘अमर अकबर एंथोनी’ से)