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जब मधुबाला ने दिलीप कुमार को गुलाब भेजा

Wed, 25 Feb 2015 11:09 AM IST
वेद, अमर उजाला, दिल्ली
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मधुबाला का असली नाम मुमताज देहलवी था। अद्भुत सौंदर्य और कला से सपन्न। मधुबाला की सुंदरता पर हर कोई फिदा था। पर उसे जिसे पहले अपने जीवन में अपनाना चाहती थी वह एक संगीतकार थे। वही मोहिंदर जिन्होंने गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा गीत की यादगार धुन बनाई थी।
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मधुबाला उनसे खासी प्रभावित थी। कहा जाता है कि उसने मोहिंदर के सामने अपने मन की बात कही। मोहिंदर शादीशुदा थे। वह एकाएक आए इस प्रस्ताव पर कुछ न कह सके। लेकिन हां नहीं कहा लेकिन इंकार भी नहीं किया। मुझे सोचने के लिए वक्त चाहिए। यह कहकर उन्होंने कुछ दिन बाद जो जवाब मधुबाला को दिया, वह इंकार में ही था।

हालांकि मधुबाला ने उनसे कहा था कि वह उनके परिवार की परवरिश के लिए अपनी तरफ से खर्च देती रहेगी। लेकिन मोहिंदर अपने परिवार को बिखरता न देख सके। उन्होंने मधुबाला से निकटता खत्म की। और एक रिश्ता बनते बनते रह गया। लेकिन मधुबाला का प्यार कबूल हुआ जब युसूफ यानी दिलीप कुमार ने उनका भेजा हुआ गुलाब ले लिया।
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कहा जाता है कि मधुबाला दिलीप कुमार की प्रशंसक थी। पहली बार जब उसने दिलीप कुमार को अपने सामने देखा तो उसे उनमें अपना संसार दिखा। दिलीप भी कुंवारे थे। मगर उन्हें यह अहसास नहीं था कि मधुबाला उन्हें मन ही मन चाहने लगी है। एक दिन उनके पास कोई आया और कहाकि मधुबालाजी ने यह पत्र और पैकेट दिया है।

दिलीप ने पत्र पढ़ा उसमेंलिखा था आपको एक गुलाब का फूल भेज रही हूं। प्यार कबूल हो तो गुलाब अपनेपास रखिए वरना इन्हीं हाथों वापस भेज दीजिए। दिलीप कुमार ने वह फूल अपने पास रख लिया। फिल्म के दो बेहतरीन सितारों का एक रोमांटिग सफर शुरू हुआ।

लेकिन इस प्यार पर बहुत पहरे थे। मधुबाला उनसे लड़ नहीं पाई। वह पहरे में इस कदर सिमटी कि उससे वो फिल्में भी छिनी जिनमें दिलीप कुमार हीरो थे। क्योंकि मधुबाला का परिवार उन्हें बाहर की शूंटिग की इजाजत नहीं दे रहा था। उसके पिता अताउल्ला खान की ही चली।

मुगले आजम बनने तक वहां केवल एक बीती कहानी थी। अनारकली अपनी मोहब्बत का इजहार अकबर से करने में नहीं हिचकिचाई थी। लच्छू महाराज के अद्भुत नृत्य संयोजन में मधुबाला अनारकली बनकर महफिल को रोशन कर रही थी। वह तख्त पर बैठे सबसे शक्तिशाली बादशाह के समक्ष बेखौफ संवाद कर रही थी।

लेकिन इसी फिल्म में कुछ ऐसा था जो रिस रिस कर दो रिश्तों के टूटने का गवाह बन रहा था। मुगले आजम तक कुछ न बचा था। दो धाराएं अलग हो चुकी थीं। बस इस कहानी को किसी तरह बनना था। महबूब की एक ग्रेट फिल्म। नौशाद के संगीत में जगमगाती और लता की बेशकीमती आवाज। क्या कुछ नहीं इस फिल्म में। हसीन मधुबाला फिल्म के एक एक दृश्य मानो उसकी अपनी जिंदगी से जुड़ा था।

फिल्म के एक दृश्य में वह एक गुलाब सलीम को सुंघाती है। सल्तने हिंद बादशाह अकबर का फरमान था। खामोश दूर तक ताकती आंखें। जैसे उन पलों को याद करती रही होगी जब उसने किताब के बीचों बीच एक लिफाफे में एक गुलाब यूसूफ तक पहुंचाया था।

प्यार कबूल था पर जिंदगी में साथ न चल सके। यूसूफ ने आते वक्त में सायरा बानू से शादी कर ली और मधुबाला मिसेस किशोर हो गईं। लेकिन उन्हें भी अहसास था कि जिंदगी के ज्यादा दिन नहीं। मुगले आंजम के नृत्य और अभिनय को देखने उनके एक प्रशंसक जुल्फीकार भुट्टों भी शूटिंग देखने आया करते थे।

दुनिया मधुबाला को चौंक कर देख रही थी, उसका ग्लैमर लोगों पर छाया हुआ था, लेकिन वह नृत्य करते करते सिहर सी उठती थी। वह भी जानती थी कि दुनिया में उसके लिए बहुत दिन नहीं। आज मधुबाला की यादें हैं। फिल्म में हमेशा सौंदर्य छाया रहा लेकिन लोग यही कहते हैं मधुबाला कुछ और थी।
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