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तो इसलिए हीरोइन बन सकीं रानी मुखर्जी

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यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्म मर्दानी के प्रमोशन के बाद ओरछा से कार में सवार होकर फिल्म अभिनेत्री रानी मुखर्जी झांसी के लिए रवाना हुईं तो अपने बचपन की स्मृतियों में खो गईं। फूटा चौपड़ा कालीबाड़ी स्थित अपनी पैतृक हवेली की बात करते- करते भावुक हुईं रुपहले परदे की स्टार ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में साठ के दशक का वह किस्सा सुनाया जो अब तक बहुत कम लोग जानते होंगे।
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उन्होंने बताया कि उनके चचेरे दादा शशधर मुखर्जी झांसी से भागकर मुंबई गए थे। आज मुखर्जी फैमिली उन्हीं की बदौलत बॉलीवुड में अपना मुकाम हासिल कर सकी है। रानी ने बताया कि उनके दादा हरिपद मुखर्जी उन दिनों झांसी में जज हुआ करते थे और वह अपने छोटे भाई शशधर मुखर्जी को एक अच्छा बैरिस्टर बनाना चाहते थे, पर शशधर को तो फिल्मी दुनिया का ग्लैमर मन में बस गया था।

अशोक कुमार ने दी सलाह

शहर के धनाढ्य व हवेली वालों में गिने जाने वाले सौ लोगों के मुखर्जी परिवार में अधिकतर लोग अच्छे सरकारी पदों पर थे, इसलिए शशधर पर भी अच्छा वकील बनने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। लेकिन, भगवान को कुछ और ही मंजूर था। शशधर समय- समय पर अपने दूर के रिश्तेदार फिल्म अभिनेता अशोक कुमार से बातचीत करते रहते थे। अशोक कुमार ने उन्हें मुंबई आने की सलाह दी, लेकिन बड़े भाई हरिपद मुखर्जी फिल्म दुनिया में उनके प्रवेश के खिलाफ थे। बड़े भाई से काफी आरजू मिन्नत के बाद जब बात नहीं बनी तो एक रात शशीधर मुखर्जी कुछ रुपये लेकर चुपचाप झांसी से मुंबई भाग गए।

इसके बाद तो पांच वर्ष के अंदर उनका नाम बड़े फिल्म निर्माताओं में शुमार हो गया। इसके बाद चचेरे दादा जी ने उनके पिता राम मुखर्जी व चाचा सुबोध मुखर्जी को भी मुंबई बुलाकर  फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतार दिया। परिवार के अन्य सदस्य तो पर्दे के पीछे ही रहे, लेकिन जाय मुखर्जी, काजोल और रानी ने स्वयं भी अभिनय की दुनिया में कदम रखा।  

भावुक हो गईं रानी

गाड़ी की रफ्तार के साथ अतीत की यादों का सिलसिला भी गति पकड़ता जा रहा था। कुछ देर के लिए रानी बेहद भावुक हो गईं, उन्होंने कहा कि आज अगर डैडी झांसी में साथ होते तो कितना अच्छा होता। उन्होंने बताया कि बीमारी के कारण वह झांसी नहीं आ सके। रानी ने कहा कि बचपन में हम लोग छुट्टियों के दौरान मां और डैडी के साथ झांसी आते थे।

उस समय की यादें आज भी ताजा हैं। किले पर मार्निंग वॉक के बाद फूटा चौपड़ा के बाहर की दुकानों पर दूध जलेबी का नाश्ता तथा कचौडिय़ों का स्वाद आज भी जेहन में है। स्वास्थ्य खराब होने के कारण डैडी को समोसे व जलेबियां खाने से मना कर दिया गया है, लेकिन जब वह झांसी के लिए चलीं तो उन्होंने कहा कि कालीबाड़ी वाले समोसे व जलेबियां लेती आना।  

कार झांसी शहर में प्रवेश कर चुकी थी, रानी ने कहा कि बीस वर्ष में शहर में बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन किले के अंदर पहुंचते ही वह उछल पड़ीं। उन्होंने कहा, अहा यहां तो सब कुछ पहले जैसा ही है। उन्होंने झांसी के लोगों को संदेश देते हुए कहा कि अपनी बेटियों को झांसी की रानी की तरह बनाएं।
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झांसी के होने का गर्व

 रानी मुखर्जी को कोई झांसी की रानी कहे तो उन्हें गर्व महसूस होता है। उन्होंने यह भी कहा कि बुंदेलखंडी कहलाने में उन्हें फक्र महसूस होता है। उनकी दिली तमन्ना है कि इस क्षेत्र के विकास के लिए अलग बुंदेलखंड राज्य बने। सिने तारिका ने कहा कि वह इस मायने में सौभाग्यशाली हैं कि भारत के अलग- अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व कर रहीं हैं। मां कोलकाता की हैं। पिता यूपी के हैं और शादी के बाद अब वह पंजाबी परिवार की बहू बन चुकीं हैं।
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