आप समझ ही गए होंगे कि हम फिल्म `आनंद’ की बात कर रहे हैं, जिसे निभाकर राजेश खन्ना अपना नाम बेहतरीन अदाकार के रूप में दर्ज कर गए। हिंदी सिनेमा के इतिहास का यह एक ऐसा किरदार था, जो फिल्म में मरने के बाद भी लोगों के दिलों में अमर हो जाता है।
सोचिए यदि शशि कपूर, उत्तम कुमार या किशोर कुमार में से किसी ने भी `आनंद’ के लिए हामी भर दी होती, तो हमें राजेश खन्ना से ‘बाबू मोशाय’ के खास अंदाज वाले संवाद कभी सुनने को नहीं मिलते। आनंद बनने के पीछे की कहानी उस दोस्ती की दास्तान है, जिसे एक निर्देशक अपने एक्टर दोस्त के लिए दुनिया को सुनाना चाहता था।
एक दोस्ती से निकली थी यह फिल्म
ये दोस्ती थी ऋषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की। एक बार राज कपूर गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। ऋषिदा को अपने दोस्त के बारे में बुरे-बुरे खयाल आने लगे। उनकी मौत का विचार उन्हें दिन-रात परेशान करने लगा। उन्होंने इसे बड़े परदे पर उतारने का मन बनाया और लग गए `आनंद’ पर काम करने।
मुख्य भूमिका के लिए राज कपूर के सिवाय किसी और कलाकार का नाम तो वे सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन वह अपने दोस्त राज कपूर को परदे पर मरते भी नहीं देखना चाहते थे। अंततः उन्होंने उनकी जगह उनके छोटे भाई शशि कपूर को लेने का मन बनाया।
शशि ने किया करने से मना
शशि इस भूमिका को करना नहीं चाहते थे, इसलिए `आनंद’ की कहानी बांग्ला फिल्मों के मशहूर स्टार उत्तम कुमार और गायक-अभिनेता किशोर कुमार के पास भी पहुंची, लेकिन वहां भी बात नहीं बनी।
बाद में राजेश खन्ना का नाम `आनंद’ के लिए तय हो गया। नियति ने अपना काम कर दिया था। क्या कोई सोच सकता है कि आनंद राजेश खन्ना के बगैर भी बन सकती थी। राजेश खन्ना की जगह कोई और कलाकार ये संवाद बोलता तो क्या हमारे ऊपर ये संवाद इतना गहरा असर डाल पाते?