जिस तरह जानी मानी अभिनेत्रियां अपने लिए लताजी की आवाज चाहती थीं, उसी तरह आज श्रेया घोषाल की आवाज सबको चाहिए। बेशक, उनकी गायकी मन को राहत देने वाली है, लेकिन बदलते समय के लिए उन्होंने स्पाइसी आइटम वाले गानों के लिए भी अपने को तैयार कर लिया है।
आखिर श्रेया के मन की चाहत क्या है? संगीत में बने रहना है तो जमाने के साथ चलना है। लिहाजा, वह "सांसो में तेरी सांस" "पिया ओ रे पिया" जैसे गीतों पर ही नहीं ठहरतीं, बल्कि "बलमा ओ बलमा" " ऊ ला ला " " चिकनी चमेली" जैसे तेज रिदम के गीतों पर भी संगीत रसिकों को मदमस्त कर रही हैं।
वह कहती हैं कि इतना आसान नहीं स्पाइसी-आइटम गीत गाना। साथ ही यह भी कहती हैं कि बहुत अश्लीलता हुई तो गाने ठुकराने में भी कोई हर्ज नहीं। हर गीत के लिए वह तैयार नहीं हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम के सिलसिले में दिल्ली आयीं श्रेया घोषाल ने अमर उजाला से लंबी बात की।
आपके गाने सुने जा रहे हैं, क्या आपको लगता है कि पुराने दौर के गीत संगीत के लिहाज से आप कुछ चीजों को मिस कर रही हैं?
जी मैलोडी, पिछले दौर में संगीत में मैलोडी थी। खासकर रोमांटिक मैलोडी। आज के गीत संगीत में मौज तो है पर उस स्तर की मैलोडी नहीं। इसी तरह अच्छे गीत भी थे। ऐसा नहीं कि आज अच्छे लिखने वाले नहीं हैं। फिल्म में अच्छे गीत लिखने वाले अभी भी हैं, लेकिन उनसे उतना काम नहीं लिया जा रहा। सबको यही लग रहा है कि स्पाइसी गीत, हॉट गीत चाहिए। इसलिए गीत भी वैसे ही लिखे जा रहे हैं।
इसी संगीत में ऐसा खास क्या है कि जिसका आप आज के स्तर पर इन्जॉय कर रही है?
जब मैं देखती हूं कि किसी मॉल्स में, किसी पार्टी में, जहां कहीं भी लोग मेरे किसी गीत पर थिरक रहे हैं, नाच रहे हैं, गा रहे हैं, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है, तब मुझे लगता है कि मेरे गीतों पर ये युवा मस्त हो रहे हैं, आनंद उठा रहे हैं। मुझे अच्छा लगता है।
आखिर वक्त बदला है, लोगों की जीवन शैली बदली है, तकनीक बदली है, उसी स्तर पर संगीत में भी बदलाव आना स्वाभाविक है। सच है कि जीवन जिस तरह का होता है, संगीत पर उसका असर पड़ता है। यह सब अपने आप होता है, कोई जानबूझकर नहीं करता।
क्या हॉट गीत गाना आपके लिए आज के समय की मजबूरी है?
देखिए, हॉट या स्पाइसी गीत गाना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक बड़े चेलेंज की तरह है। सच तो ये है कि इस तरह के हॉट गीत गाना बहुत कठिन है। आपके पास अच्छी कविता-गीत हो, अच्छा मैलोडी वाला संगीत हो, फिर गाने का एक माहौल बनता है। आप अपने को पूरी तरह उसमें रम जाते हैं।
इसके विपरीत गीतों में समझ में ना आने वाले शब्द हों। बिना भाव वाले वाक्य हों, फिर उन पर गाना, और इस तरह गाना कि सबको पसंद आ जाए, बड़ा कठिन है। दो तीन मिनट का गीत या तो छा जाता है, या फिर एकदम बाहर हो जाता है। अब वो ट्रेंड गया कि कोई गीत धीरे-धीरे लोगों की जुबान पर आएगा या उसे सुना जाएगा।
हॉट गीतों का ऐसा दौर है, तो आप सब कुछ गाना चाहेंगी?
नहीं ऐसा भी नहीं। सच तो ये है कि मैंने ऐसे कुछ गीतों को गाने से इंकार कर दिया। आखिर हर चीज की एक सीमा है। जहां तक चल सकता है, वो ठीक है, लेकिन इतना नहीं कि हम बहक ही जाएं।
आप दूसरी भाषाओं मसलन बंगाली, असमी, राजस्थानी, तेलुगु में भी गा रही है, कैसा अऩुभव है यह?
हर लैंग्वेज का अपना कलर है। इसका हर तरह से इन्जॉय करती हूं। मैं बांग्ला भाषी हूं। घर पर बांग्ला में ही बोलती हूं। राजस्थान में मेरी बचपन में परवरिश हुई है। इसलिए इन राज्यों के लोकसंगीत, जीवन को मैंने महसूस किया है। लेकिन अब दूसरी भाषाओं में भी गीत गाने का अवसर मिल रहा है।
आप देखेंगे कि भारतीय फिल्मों में बहुत सी धुनें और गीत लोकसंगीत से प्रभावित है। इस टच को महसूस किया जाता है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भारत की अपनी भाषाएं ही नहीं, पूरी दुनिया का संगीत सब तक पहुंच रहा है। इसलिए इसका फैलाव भी हुआ है।
ऐसे कौन से गीत हैं जिन्हें सुनकर आपको लगता है कि काश आप ये गीत गातीं?
एक नहीं कई गीत हो सकते हैं ऐसे। खासकर तब जबकि हमारे पास फिल्म संगीत की इतनी समृद्ध धरोहर हो। पर "बहारों मेरा जीवन भी संभारो", "माई री कासे कहूं," "हमारी याद आएगी", "किस तरह भूलेगा दिल", "ये जिंदगी उसी की है", "मेघा छाए आधी रात", "इन आंखों की मस्ती के", "पिया तोसे नैना लागे रे" जैसे गीत मन को छूते हैं।
आज आपके पास शोहरत है, आपकी संगीत की चर्चा है। वो कौन सा पल था जो सही मायने में आपको ट्रैक पर लाया?
हर चीज का अपना अपना योगदान होता है। पर 'सारेगामा' कंटेस्ट में कल्याणजी ने मुझे मुंबई आने की सलाह दी। हमारा परिवार मुंबई आ गया। और फिर जब फिल्म देवदास में पारो की आवाज के लिए मुझे चुना गया तो मेरी जिंदगी बदल गई। इसके बाद हर गीत मेरे लिए एक नए अवसर की तरह होता है।
आप नाच भी लेतीं हैं। गाना भी गाती है, माडलिंग भी फिर फिल्म अभिनेत्री बनने में क्या हर्ज है?
बिल्कुल इस पर भी सोचा जा सकता है। फिलहाल गाने गा रही हूं। अभी मेरी प्राथमिकता यही है।
आप पढ़ने की भी शौकीन हैं। क्या पढ़ना पसंद करती है ?
मैं रोज कुछ न कुछ जरूर पढ़ती हूं। फिक्शन भी। खासकर झुंपा लहरी की किताबें पढ़ी हैं। अच्छी लगी। अमिताभ घोष को भी पढ़ा। कितनी भी व्यस्त रहूं पढ़ने के लिए थोड़ा समय निकालती हूं।
हाल में फिल्मी गीतों का चलन सूफी गीतों की तरफ रहा। फिर आइटम सॉन्ग सुने जा रही हैं। अब आगे फिल्म संगीत किस तरफ करवट लेगा?
लोग शायद फिर रोमाटिंक गीतों को सुनना पसंद करेंगे। ड्यूट सांग बहुत सुने जा रहे हैं इन दिनों। मैं अपने शो में भी देखती हूं फरमाइश की ज्यादातर पर्चियां रोमांटिक गीतों को लेकर ही होती हैं। अभी हाल में एक कन्सर्ट में "जादू है नशा है", "सांसों में तेरी", "तेरी ओर", "तेरी मेरी प्रेम कहानी" जैसे गीतों के लिए बार बार फरमाइश हुई।
अब आप जज की कुर्सी पर भी बैठ गई हैं। क्या माना जाए कि आपने अपना मुकाम पा लिया?
नहीं नहीं, मैं अभी भी सफर में हूं। मैं कोई आइकन नहीं हूं।