अरशद वारसी की नई कॉमेडी फिल्म ‘मि.जो बी.कारवाल्हो’ जल्द ही रिलीज होने वाली है। अरशद ने इससे जुड़ी लंबी बातचीत की।
नए साल में अरशद वारसी की ‘मि.जो बी.कारवाल्हो’ और ‘डेढ़ इश्किया’ रिलीज के लिए तैयार हैं। अरशद इन फिल्मों में एक बार फिर दर्शकों को गुदगुदाएंगे। फिल्मों में कॉमेडी, बॉलीवुड में टैलेंट और अपने कैरियर को लेकर अमर उजाला से क्या कुछ उन्होंने।
आपके खाते में कई कॉमेडी फिल्में हैं, मगर सेक्स कॉमेडी से दूर रहे हैं। ऐसा तो नहीं है कि आपको ऑफर नहीं मिले?
मैं कोई भी रोल स्वीकार करने से पहले अपने बच्चों के बारे में सोचता हूं कि वो देखेंगे तो क्या सोचेंगे। मुझे लगता है कि आज बच्चे बड़ी इज्जत की नजर से देखते हैं और अगर मैं ऐसे-वैसे रोल करने लगा तो पता नहीं कैसे देखेंगे।
सिर्फ सेक्स कॉमेडी ही नहीं, ऐसा कुछ भी जो मेरे सम्मान पर जरा भी आंच पहुंचाता हो वह मैं नहीं कर सकता। ‘मुन्नाभाई’ से पहले एक वक्त ऐसा भी था कि मेरे पास तीन साल तक काम नहीं था, तब मैंने कुछ ऐसा-वैसा नहीं किया तो अब क्या करूंगा।
कठिन दौर देखने के बाद भी आपमें दनादन फिल्में साइन करके पैसा बटोरने की भूख नहीं दिखती?
मेरे अंदर कोई लालच नहीं है। मैं परिवार के साथ वक्त बिताना चाहता हूं। मुझे वीकेंड पर कोई पार्टी में बुला लेता है तो बड़ा खराब लगता है। मैं नहीं जाना चाहता। मेरी लाइफ स्टाइल के बारे में एक उदाहरण दूं कि मुझे नहीं लगता कि आज मेरे पास ये कार है, कल वो होनी चाहिए। मैं अपनी कार तब तक नहीं बदलता जब तक कि वो पूरी तरह चलने लायक नहीं रह जाती।
‘मुन्नाभाई’ से पहले वे कौन सी गलतियां थीं, जो आप अब नहीं दोहराना चाहेंगे?
मेरी सबसे बड़ी गलती यह थी कि मुझे तब न इंडस्ट्री का बड़ा डायरेक्टर पता था और न बड़ा बैनर। लेकिन आज मुझे पता है कि अच्छे फिल्ममेकर्स कौन हैं। मैं जानता हूं कि अच्छी फिल्म कैसी होती है, खराब कैसी। पहले मैं सिर्फ कहानी सुन कर फिल्म करने को तैयार हो जाता था।
शायद यही कारण है कि कहा जाता है, अरशद निर्देशक के काम में बहुत दखल देते हैं?
मैं दखल नहीं देता। सुझाव देता हूं। कितनी भी बढ़िया स्क्रिप्ट हो, सेट पर उसे और शानदार बनाने की गुंजाइश हमेशा रहती है। समझदार आदमी वह है जो यह समझ ले। अंदर की बात बताऊं कि मेरे कई दोस्त कह चुके हैं कि मैं बढ़िया स्क्रिप्ट राइटर बन सकता हूं क्योंकि सेट पर मैं कई दृश्यों को तराश देता हूं। लेकिन राइटिंग में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। हां, यह हो सकता है कि कल को मैं कोई फिल्म डायरेक्ट करूं। अगर कोई मेरी बात नहीं मानता है तो मैं दबाव भी नहीं डालता।
आपने कहा कि अब समझ चुके हैं अच्छी और बुरी फिल्म क्या होती है। विस्तार से समझाइए?
इसे समझने के दो नजरिये हैं। पहला है निर्माता का। उसने पैसा लगाया और फिल्म ने उसे दो गुना-चार गुना लौटाया। यह फिल्म उसके लिए अच्छी है। परंतु एक मेकर या क्रिएटिव आदमी का नजरिया यह होगा कि कहानी में दम है कि नहीं। कलाकारों ने काम बढ़िया किया या नहीं। उसे फिल्म बनाकर संतोष मिला कि नहीं। आज बॉक्स ऑफिस कलेक्शन सबसे अहम है। हाल के समय में कई फिल्मों ने करोड़ों कमाए, जो बहुत बकवास हैं, तो क्या ऐसी फिल्मों को अच्छा मान लें?
क्या नहीं लगता कि कॉमेडी में ही अटक कर रह गए हैं?
अगर मैंने अपनी पहली फिल्म में सीरियस रोल किया होता तो लोग मुझे आज तक वही रोल दे रहे होते। मैं मानता हूं कि अलग-अलग तरह के किरदार निभा कर मुझे बहुत खुशी होगी, लेकिन निर्माता-निर्देशक ऐसा नहीं मानते। मैंने ‘सहर’ और ‘जिला गाजियाबाद’ जैसी फिल्में भी की, लेकिन बात नहीं बनी।