राजकुमार हिरानी का नाम टिकट खिड़की पर सफलता का पर्याय है। थ्री इडियट्स के पांच साल बाद उनकी फिल्म पीके आज सिनेमाघरों में पहुंच रही है। हिरानी सबके देखने योग्य और सबके मन को भाने वाली फिल्में बनाते हैं। यही कारण है कि उनकी फिल्मों का इंतजार किया जाता है। पीके को लेकर भी उन्होंने कुछ बताया है...
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प्रमोशन के दौरान फिल्म पर आपकी टीम ने चुप्पी साधे रखी। क्या कारण है?
हमें लगता है कि पीके में जो दिखा रहे हैं उसके बारे में दर्शकों को सीधे सिनेमा हॉल में पता चले तो ज्यादा मजा आएगा। हम कुछ भी कह कर फिल्म के आनंद को कम नहीं करना चाहते थे।
आमिर ने संकेत दिए थे कि इसमें विस्थापन को लेकर कुछ बात है!
ऐसा कह सकते हैं लेकिन सिर्फ यही नहीं, फिल्म में बहुत सारी बातें हैं।
पोस्टरों में आमिर अलग-अलग रूप में दिखे। यह भी चर्चा हुई कि वह दूसरे ग्रह के प्राणी बने हैं। ट्रेलर में अनुष्का अपने दोस्त की कहानी कह रही हैं। क्या माजरा है?
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हम लोग मुश्किल में हैं कि मीडिया को आखिर क्या बताएं, क्या छुपाएं। फिल्म का फॉरमेट वही है जैसे थ्री इडियट्स में था कि एक किरदार अपने दोस्त की कहानी बता रहा है। यहां अनुष्का आमिर की कहानी बता रही हैं। फिल्म में आमिर भोजपुरी बोल रहे हैं। परंतु यह एक अलग फिल्म है। संजय दत्त, बोमन ईरानी, सौरभ शुक्ला, परीक्षित साहनी भी अहम रोल में हैं।
संजय के साथ फिल्म करने की वजह
संजय दत्त के साथ आपने एक के बाद एक दो फिल्में कीं। आमिर के साथ भी थ्री इडियट्स के बाद अगली फिल्म। कोई खास कारण?
यह सिर्फ संयोग है। मुन्नाभाई के बाद एक और कहानी मुन्नाभाई की ही लिखी गई तो संजय को लिखा। थ्री इडियट्स के बाद जब पीके लिखी गई तो लगा कि आमिर इसमें एकदम परफेक्ट हैं। ऐसे हीरो की जरूरत थी जिसकी शक्ल पर मासूमियत हो। आमिर के चेहरे पर ये नजर आती है। वे बच्चे जैसे लगते हैं। रोल उनके लिए सूटेबल था।
आमिर के एलियन होने की चर्चा है तो क्या यह माना जाए कि आपका इनमें भरोसा है। आपको लगता है कि दूसरे ग्रहों पर जीवन हो सकता है?
एलियंस हमने देखे नहीं हैं। जहां तक दूसरे ग्रहों पर जीवन की बातें हैं तो हमारे पास इसका कोई सबूत नहीं है। ऐसी कहानियां आती रहती हैं। कई चीजों के जब हमारे पास जवाब नहीं होते तो हम उनके इर्द-गिर्द किस्से कहानी गढ़ लेते हैं। ऐसी बातों को चमत्कार कहने लगते हैं।
मगर साइंस काम कर रही है। सवाल हैं कि क्या कभी दूसरे ग्रहों पर जीवन मिलेगा, क्या हम अन्य ग्रहों पर पहुंच सकेंगे, विदेश में इन विषयों पर साइंस-सिनेमा भी बने हैं।
मैं आपको एक मजेदार बात बताता हूं। पीके के राइटर अभिजात जोशी ने एक दिन मुझसे यह बात कही कि साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंस से किसी ने पूछा कि क्या हम कभी टाइम ट्रेवल (अतीत या भविष्य की यात्रा) कर पाएंगे? उनका जवाब यह था कि मुझे नहीं लगाता कि टाइम ट्रेवल नाम की कोई अवधारणा है। जब पूछा गया कि क्यों तो उन्होंने कहा, ‘अगर ऐसा होता तो शायद आगे के वक्त से कोई यहां आ चुका होता। भविष्य है, ऐसा कोई सबूत हमारे पास नहीं है।’
बॉक्स ऑफिस को लेकर क्या?
इसके बावजूद साइंस की कोशिशें तो जारी हैं
मुझे लगता है कि इस पूरे ब्रह्मांड में हम एक छोटे से ग्रह पर बैठ कर तमाम बातें सोच रहे हैं। जबकि करोड़ों गोले घूम रहे हैं अंतरिक्ष में। हमें बहुत कुछ जानना, समझना है। शायद एक मानव सभ्यता होने से हम खुद को बहुत कुछ समझते हैं। विशाल ब्रह्मांड को देखें तो हम बहुत तुच्छ हैं, हमारी कोई कीमत ही नहीं है।
हमें नहीं मालूम कि क्या वाकई और कहीं भी प्राणी हैं? ब्रह्मांड में जितना हम देख पाते हैं ही उतनी ही हमारी समझ है। हमारे हिसाब से तो हम जी रहे हैं, परंतु क्या वाकई यही जीवन है? क्या पता कि कौन कैसा है, तरल रूप में है या गैसीय रूप में है! हमें यही तक नहीं पता कि हम यहां क्यों आए हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? हमने बस अपने स्वार्थ साध लिए हैं। जमीन को बांट कर सीमाएं बना ली हैं। तेरा-मेरा कर लिया है।
इन दिनों बॉक्स ऑफिस कलेक्शन का बड़ा हौवा है!
दुखदाई बात है कि आज हम लोग फिल्म की सफलता का माप उसकी बॉक्स ऑफिस सफलता से करते हैं। मुझे लगता है कि किसी फिल्म को कितना प्यार और सम्मान मिलता है, यह पैमाना होना चाहिए। हम मुगल-ए-आजम, आनंद और अभिमान या पुरानी फिल्में देखते हैं तो यह नहीं सोचते कि इसने कितना कमाया था। यह नहीं कहते कि यार इसने तो बहुत बिजनेस किया था, यह बड़ी अच्छी फिल्म है।
हमें जज ही करना है कि फिल्म कितनी सफल है तो यह देखें कि कितने लोगों ने इसे देखा। आज थियेटरों की संख्या बढ़ा दी जाती है, टिकट महंगे कर दिए जाते हैं और तीन दिन में बिजनेस बता दिया जाता है। कितने लोगों ने फिल्म दूसरे या तीसरे हफ्ते में देखी, कितने लोगों ने फिल्म को बार-बार देखा। यह मालूम हो तो पता चलेगा कि फिल्म कैसी है।
बिल्कुल होता है दबाव। फिल्म बनाना सस्ता काम नहीं है। बहुत पैसा लगता है। निश्चित रूप से मैं चाहता हूं कि लोग फिल्म देखें। पहला लक्ष्य होता है कि लोगों को फिल्म अच्छी लगे। दूसरा लक्ष्य होता है यह बिजनेस भी करे।
मैं किसी का नुकसान नहीं चाहता। जिसने पैसा लगाया वह कमा भी ले और मैं भी अगली फिल्म बना सकूं। परंतु इस दबाव को अपनी रचनात्मकता पर हावी नहीं होने देता। फिल्म में आइटम डांस या जबर्दस्ती कॉमेडी सीन नहीं डालता।
थ्री इडियट्स और पीके के बीच पांच साल का अंतराल है। क्या अगली फिल्म में भी इतना वक्त लेंगे?
नहीं नहीं... इसमें बहुत वक्त लग गया। अगली फिल्म जल्दी बनाऊंगा। डेढ़-दो साल में। वह फिल्म संभवतः संजय दत्त के जीवन पर आधारित होगी।