पर्दे पर हमेशा अलग-अलग ढंग के किरदार निभाने वाली कंगना रनौत फिल्म ‘क्वीन’ में मनोरंजन के साथ नवयुवतियों और समाज के लिए कई संदेश लेकर भी आ रही हैं।
‘क्वीन’ के बारे में इतना तो पता लग ही गया है कि यह लड़की अकेले हनीमून मनाने विदेश जा रही है! आखिर क्या है मामला...?
यह फिल्म एक छोटे शहर की लड़की रानी की कहानी है। फिल्म उसके निजी विकास की यात्रा है। फिल्म में संदेश भी हैं। रानी हमारे आस-पास की लड़की है, जिसे उसके घर में यह मत करो... वह मत करो... ऐसी रहो... वैसी रहो कह कर पाला गया है। उसमें बिल्कुल आत्मविश्वास नहीं है।
हालत यह है कि किसी को डांट पड़ रही हो तो वह रोने लगती है। स्थिति यह है कि शादी की तैयारियां हो रही हैं और मंगेतर उसे छोड़ कर चला गया है...! सब उसे ‘बहनजी’ कहते हैं। लेकिन कैसे वह इन बातों से टकराते हुए अपनी जगह बनाती है यह फिल्म में दिखाया गया है।
आपने कहा फिल्म में संदेश भी हैं...?
संदेश समाज के लिए है कि आप अपनी बच्चियों से किस तरह का व्यवहार करते हैं। आपको कैसा व्यवहार करना चाहिए। व्यक्तिगत बात करूं तो मैं छोटी थी तो मुझसे कहा जाता था कि तुम ऐसा बिहेव करती हो, ससुराल में जाकर क्या करोगी? पांच साल की बच्ची तक को यह बात बोल दी जाती है।
हमें सोचना चाहिए कि लड़कियां भी समाज का उतना ही हिस्सा हैं, जितना लड़के। हम तरक्की करना चाहते हैं दुनिया के विकसित मुल्कों के साथ खड़े होना चाहते हैं तो हमें अपनी लड़कियों-औरतों को उतने ही मौके देने होंगे जितने विकसित मुल्कों में हैं। आज हमारी आबादी का करीब 49 फीसदी लड़कियां और महिलाएं हैं।
आप खुद छोटे शहर से आई हैं। ऐसे में रानी के किरदार में खुद से कितनी समानता पाती हैं?
मेरे सामने भी छोटे शहर से आने के कारण कुछ समस्याएं रही हैं, लेकिन रानी की कुछ बातें सचमुच बड़ी जटिल हैं जैसे उसमें जरा भी आत्मविश्वास नहीं है। वो खुद के लिए भी खड़ी नहीं हो पाती। ये बातें मेरे लिए कभी समस्याएं नहीं थीं।
फिल्मों में आपके किरदार बड़े इमोशनल होते हैं। ऐक्टर के रूप में उनसे जुड़ना और फिर खुद को अलग करना कैसे हो पाता है?
किरदार से जुड़ने और अलग होने, दोनों में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। पूरा खेल साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) का है। आपको खुद को मानसिक तौर पर तैयार करना पड़ता है कि जो कुछ इस किरदार के साथ हो रहा है वह असल में मेरे साथ हो रहा है। तभी काम हो पाता है।
कभी यह दांव उल्टा भी पड़ जाता है और किरदार सचमुच आप पर हावी हो जाता है। मैं खुद किरदार से जुड़ने के बाद उससे अलग होने के लिए योग और ध्यान का सहारा लेती हूं। किरदार से अलग होने में दो से तीन हफ्ते लग जाते हैं और कभी कभी तो दो से तीन महीने भी। यही कारण है कि मैं आम तौर पर एक बार में एक ही फिल्म में काम करती हूं।
‘क्वीन’ से पहले आपकी ‘रज्जो’ आई थी। इसके बाद ‘रिवॉल्वर रानी’ और ‘तनु वेड्स मनु-2’ आएगी। क्या आप किसी रणनीति के तहत हीरोइन प्रधान फिल्में कर रही हैं?
ऐसा नहीं है। ऐक्टर होने के नाते आपको हमेशा जो आपके पास आ रहा है, उसमें से चुनना पड़ता है। अगर डायरेक्टरों को लगता है कि मैं ऐसे रोल अच्छे से कर सकती हूं तो वे मुझे ऑफर करते हैं।
आमिर खान ने ‘कॉफी विद करन’ में आपको फिल्म इंडस्ट्री की सबसे सेक्सी हीरोइन बताया है! क्या कहेंगी?
इसका कोई खास मतलब नहीं निकालना चाहिए। उन्होंने ‘क्वीन’ का ट्रेलर देख कर मुझे फोन किया था और उनकी पत्नी किरण राव ने भी कहा है कि वह यह फिल्म देखना चाहती हैं। मुझे लगता है कि जिस तरह से अभी मेरा कैरियर आगे बढ़ रहा है, लोग मुझे पसंद कर रहे हैं।
‘क्वीन’ में बॉयफ्रेंड के छोड़ जाने पर रानी का दिल टूट जाता है। रियल लाइफ में आप कैसा बॉयफ्रेंड या हसबैंड चाहती हैं?
मैं हमेशा कहती हूं कि आपको जीवन में कोई साथी मिल जाता है तो अच्छी बात है लेकिन जिंदगी का वो मकसद नहीं होना चाहिए। इतना बड़ा जीवन है, लोग मिल ही जाते हैं लेकिन जिंदगी में वह प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए और न ऐसा हो कि उसके लिए आप जीवन ही खराब कर लो।