अपनी विशेष फिल्म स्टाईल के लिए नाम और शोहरत कमाने वाले गुरुदत्त ने ऐसा भी समय देखा है जब वह दाने-दाने को मोहताज थे।
रियल एस्टेट के व्यवसाय में उन दिनों रिजवी ब्रदर्स का काफी नाम था। मुंबई में पाली हिल स्थित गुरुदत्त के आवास की बिक्री उन्हीं के माध्यम से हुई थी और फिर उसी इलाके में नया अपार्टमेंट भी उन्होंने ही गुरुदत्त को दिलवाया था।
यह तब की बात है, जब अपनी कालजयी फिल्म `कागज के फूल’ की अप्रत्याशित विफलता के बाद गुरुदत्त दाने-दाने के मोहताज हो गए थे। `चौदहवीं का चांद’ बनाने के बाद हालांकि उन्हें उस जिल्लत से मुक्ति मिल गई थी, तब भी अपने उस फ्लैट को उन्होंने नहीं छोड़ा और वहीं उनका अवसान हुआ।
रिजवी ब्रदर्स के सबसे छोटे पार्टनर याकूब हसन से मेरा भी अच्छा परिचय था। उनको लेखन में भी रुचि थी और फिल्म निर्माण में भी। उन्होंने धर्मेंद्र, मीना कुमारी, शशि कपूर और हेमामालिनी जैसे कलाकारों को लेकर `बहारों की मंजिल’ और `नाच उठा संसार’ फिल्में भी बनाईं। पहली फिल्म तो उत्तर प्रदेश फिल्म पत्रकार संघ द्वारा पुरस्कृत भी की गई।
हम दोनों की हर दूसरे-तीसरे दिन मुलाकात होती रहती थी। यह हमारा नियमित कार्यक्रम था। मुझे अब भी 10 अक्टूबर 1964 के उस मनहूस दिन की याद है। उस दिन भी याकूब भाई सरेशाम मेरे आवास पर पहुंच गए थे। झांसी से आए मेरे एक अन्य मित्र भी उन दिनों मेरे साथ ठहरे हुए थे। नाम था नारायण सिंह।
`तीसरी कसम’ में अभिनय के दौरान निर्देशक द्वारा कट कहने पर जिस तरह उन्होंने पान का बीड़ा पेश करती हुई वहीदा रहमान की उंगलियों को काट लिया था, उसकी उन दिनों पर्याप्त चर्चा थी। उस समय याकूब गुरुदत्त का खैर-मखदम करते हुए ही मेरे आवास पर आए थे, इससे उन्हीं के बारे में हम लोगों की बातचीत चल रही थी।
तभी गुरुदत्त का टेलीफोन उनके नाम आया। बोले थे, `यार, बहुत अनकंफर्टेबल महसूस कर रहा हूं। आ जाओ तो अच्छा रहेगा।’ जवाब में याकूब को यह कहते मैंने सुना, `अभी घंटे भर पहले तो आपसे मिल चुका हूं, भाईजान। फिर इस वक्त न सिर्फ रामकृष्ण बल्कि उनके एक मेहमान भी साथ में हैं। कल किसी वक्त मैं फिर मिल लूंगा।’
इस पर उनको जवाब मिला था, `तो उन दोनों को भी साथ ले आओ। खानापीना हम लोग इकट्ठे कर लेंगे।’लेकिन उनके इस आग्रह-अनुरोध को भी हम लोगों ने पूरी तरह अनसुना कर दिया। दूसरी सुबह खबर मिली कि गुरुदत्त अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए हैं।