निर्माताः गौरव धींगरा
निर्देशकः पैन नलिन
सितारेः सारा-जेन डायस, संध्या मृदुल, अनुष्का मनचंदा, पवलीन गुजराल, अमृत मघेरा, राजश्री देशपांडे, तनिष्ठा चटर्जी
रेटिंग ***
हमारे शास्त्रों में देवियां पूजनीय हैं लेकिन घर और समाज में उनका क्या स्थिति है? हमारे दौर के सबसे ज्वलंत प्रश्नों में एक यह भी है। इस पर तेज गति से मंथन हो रहा है और मंथन से अमृत तथा विष दोनों निकल रहे हैं। संसारा और वैली ऑफ फ्लावर्स जैसी खूबसूरत फिल्में बना चुके निर्देशक पैन नलिन इस बार बदलते हुए भारतीय समाज में स्त्रियों के संघर्ष का सिनेमा लाए हैं।
उल्लेखनीय बात यह है कि इस कहानी की नायिकाएं अबला नहीं हैं बल्कि शिक्षित, रचनाधर्मी और आत्मनिर्भर हैं। फिर भी उन्हें अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रूढ़ समाज और पारंपरिक सोच या तो उन्हें पंख फैलाने नहीं दे रहे या उनकी आजादी के पंख कतरने को आतुर है।
पैन नलिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह गुजरात से आते हैं और उनके पिता भी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। पैन अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में विशेष स्थान रखते हैं और उनकी एंग्री इंडियन गॉडेसेस कई देशों के फिल्म समारोहों में सराही गई है। असल में बराबरी के लिए स्त्रियों का संघर्ष सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं चल रहा।
वह अफ्रीकी और अरब विश्व से लेकर यूरोप तथा अमेरिका में भी जारी है। संघर्ष में बहने वाले रक्त का रंग एक ही होता है। नलिन के सिनेमा की स्त्रियां ग्लोबल हैं। वे कारपोरेट दुनिया से आती हैं, मनोरंजन जगत में ऊंची उड़ान के सपने देखती हैं, वे गरीबों और जरूरतमंदों के लिए जमीन पर संघर्ष कर रही हैं, वे अत्याचार के विरुद्ध चुप नहीं हैं, वे न्याय की भीख मांगने को तैयार नहीं बल्कि उसे अपना हक बता कर छीनने को हथियार भी उठा रही हैं।