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फिल्मों की इतनी कमाई, पैसे बैलगाड़ी पर लादकर घर लाने पड़े

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भारतीय फिल्म उद्योग के 'पितामह' दादासाहब फाल्के ने कुल 125 फिल्मों का निर्माण किया। 16 फरवरी 1944 को 74 साल की आयु में नासिक में भारतीय चलचित्र-जगत का यह अनुपम सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया। भारत सरकार उनकी स्मृति में हर साल सिने जगत के किसी विशिष्ट व्यक्ति को दादा साहब फाल्‍के पुरस्कार प्रदान करती है।
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1917 में हिन्दुस्तान फिल्म कंपनी के बैनर तले दादासाहब फाल्‍के ने ‘लंका दहन’ फिल्म का निर्माण तथा प्रदर्शन किया। इस सुपरहिट फिल्म से दादासाहब देशभर में लोकप्रिय हो गए। कहते हैं कि ‘लंका दहन’ के प्रदर्शन से टिकट खिड़की पर इतनी आमदनी होती थी कि सिक्कों को बोरों में भरकर बैलगाड़ी पर लादकर दादा साहब फाल्‍के के घर लाना पड़ता था।

धुंडीराज गोविंद फालके यानी डीजी फालके का 30 अप्रैल 1870 को नासिक के पास त्र्यम्बकेश्वर गांव के ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। बचपन में घर पर ही उत्तीर्ण होने पर उन्हें बंबई के कला संस्थान जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश दिलाया गया। वहां उन्होंने छात्रवृत्ति मिलने पर एक कैमरा भी खरीद लिया। इसके बाद शुरू हुई संघर्ष की वो कहानी।
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10 दिन तक देखते रहे एक ही फिल्म

कमान्य तिलक के विचारों से प्रभावित दादा फालके ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। भागीदारी में प्रिंटिंग प्रेस का संचालन किया। सन् 1911 में क्रिसमस में बंबई के एक तम्बू सिनेमा में उन्होंने लाइफ ऑफ क्राइस्ट नामक फिल्म देखी। फिल्म देखकर घर लौटे और सारी रात बेचैन रहे।

दूसरे दिन अपनी पत्नी सरस्वती काकी के साथ वही फिल्म दोबारा देखी। लगातार अलग-अलग नजरिए से उन्होंने 10 दिन फिल्म देखकर मन में निश्चय किया कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर फिल्म बनाना चाहिए। यह बात अपनी पत्नी, रिश्तेदार तथा मित्रों को बताई। सबने फिल्म निर्माण की व्यावहारिक कठिनाइयां सामने रखीं।

उभरकर सुझाव आया कि कृष्ण के जीवन में विस्तार तथा उतार-चढ़ाव अधिक हैं इसलिए किसी सरल कथानक पर फिल्म बनाना चाहिए। अंत में राजा हरिश्चंद्र का कथानक सबको पसंद आया। दादा साहब के व्यापारी मित्र नाडकर्णी ने बाजार दर पर रुपये उधार देने की पेशकश की। एक फरवरी 1912 को दादा साहब लंदन के लिए पानी के जहाज से रवाना हुए। वहां उनका कोई परिचित नहीं था।

हारकर दादा वेश्याओं के बाजार में उनके कोठे पर गए

केवल 'बायस्कोप' पत्रिका के संपादक को इसलिए जानते थे कि उसकी पत्रिका नियमित मंगाकर पढ़ते थे। दादा फालके बायस्कोप के संपादक कैबोर्ग से मिले। वह उन्हें स्टुडियो तथा सिनेमा उपकरण एवं केमिकल्स की दुकानों पर ले गया और फिल्म निर्माण का सारा सामान खरीदवा दिया। एक अप्रैल 1912 को दादा बंबई लौट आए।

पटकथा लेखन के बाद दादा फालके को तमाम कलाकार तो मिल गए, मगर महारानी तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला तैयार नहीं हुई। हारकर दादा वेश्याओं के बाजार में उनके कोठे पर गए। हाथ जोड़कर उनसे तारामती रोल के लिए निवेदन किया। वेश्याओं ने दादा को टका-सा जवाब दिया कि उनका पेशा, फिल्म में काम करने वाली बाई से ज्यादा बेहतर है।

फिल्म में काम करना घटिया बात है। दादा निराश तथा हताश होकर लौट रहे थे। रास्ते में सड़क किनारे एक ढाबे में रुके और चाय का ऑर्डर दिया। जो वेटर चाय का गिलास लेकर आया, दादा ने देखा कि उसकी उंगलियां बड़ी नाजुक हैं और चाल-ढाल में थोड़ा जनानापन है। दादा ने उससे पूछा,  यहां कितनी तनख्वाह मिलती है?

यहां कितनी तनख्वाह मिलती है?

उसने जवाब दिया कि पांच रुपये महीना। दादा ने फिर कहा कि यदि तुम्हें पांच रुपये रोजाना मिलें तो काम करोगे? उत्सुकता से वेटर ने पूछा, क्या काम करना होगा? दादा ने सारी बात समझाई। इस तरह भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की नायिका कोई महिला न होकर एक पुरुष थी। उसका नाम था अण्णा सालुंके।

1912 की बरसात के बाद बंबई के दादर इलाके में राजा हरिश्चंद्र की शूटिंग आरंभ हुई। सूरज की रोशनी में शूटिंग होती। शाम को पूरी यूनिट का खाना बनता। रात को किचन डार्करूम में बदल जाता। दादा और काकी मिलकर फिल्म की डेवलपिंग एवं प्रिंटिंग का काम करते। 21 अप्रैल 1913 को बंबई के ओलिम्पिया सिनेमा में राजा हरिश्चंद्र का प्रथम प्रदर्शन मेहमानों के लिए किया गया।

राजा हरिश्चंद्र लगातार 13 दिन चली, जो उस समय का रिकॉर्ड था। इसके बाद 1913 में कथा फिल्म ‘मोहिनी-भस्मासुर’ का निर्माण किया। इस फिल्म के लिए रंगमंच पर काम करने वाली अभिनेत्री कमलाबाई गोखले दादा साहब को मिल गईं। कमलाबाई हिंदी फिल्मों की पहली महिला नायिका हैं।

दादा साहब की अंतिम मूक फिल्म सेतुबंधन (1932) थी, जिसे बाद में डब करके आवाज दी गई। उस समय डब करना भी एक शुरुआती प्रयोग था। दादा साहब ने जो एकमात्र बोलती फिल्म बनाई उसका नाम ‘गंगावतरण’ है।     
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ये हैं वो फिल्में जिन्होंने रच दिया इतिहास

राजा हरिश्चंद्र (1913)
मोहिनी भस्मासुर (1913)
सावित्री सत्यवान (1914)
लंका दहन (1917)
श्री कृष्ण जन्म (1918)
कालिया मर्दन (1919)
कंस वध (1920)
शकुंतला (1920)
संत तुकाराम (1921)
भक्त गोरा (1923)
सेतु बंधन (1932)
गंगावतरण (1937)
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