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जुबान फिल्म समीक्षा: बहुत सारी उलझन

Fri, 04 Mar 2016 05:41 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई

सार

  • निर्माताः गुनीत मोंगा
  • निर्देशकः मोजेज सिंह
  • सितारेः विक्की कौशल, सारा जेन डायज, मनीष चौधरी, राघव चनाना
  • रेटिंग **
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- फोटो : twitter
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विस्तार
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अगर आप कुछ अलग देखने की उम्मीद लेकर जाएं और वह पूरी न हो तो दो विकल्प हैं। खुल कर कहें या जुबान बंद रखें। अपनी पहली फिल्म लेकर आए मोजेज सिंह की जुबान देखने के बाद यही रास्ते आपके पास रह जाते हैं।
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अपनी बातों और फिल्म के ट्रेलर में मोजेज जो कहते हैं, फिल्म उस पर खरी नहीं उतरती। विदेश में सिनेमा की पढ़ाई करके हिंदुस्तानी फिल्म बनाने की कोशिश कहीं-कहीं तो कामयाब है मगर घालमेल भी साफ दिख जाता है।

नतीजा, बहुत सारी उलझन। इसमें संदेह नहीं कि मोजेज ने एक अलग तरह की कहानी कहने का प्रयास किया है लेकिन उसमें सहजता नहीं रख सके। उसे जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के चक्कर में न तो भारतीय बना सके और न ही पश्चिमी।
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मोजेज की फिल्म लड़के की अंतरयात्रा नहीं दिखा पाती

- फोटो : twitter
118 मिनट की यह फिल्म एक लड़के की जिंदगी है जिसे अपनी पहचान (अंग्रेजी में: सेल्फ) की तलाश है। वह अपने अतीत से भाग रहा है और उसके सामने एक आदर्श है, जिसके जैसा वह बनना चाहता है। मगर जब बीज गूलर के हों तो पेड़ पर जामुन कैसे लगेंगे?

मोजेज की फिल्म इस लड़के की अंतरयात्रा नहीं दिखा पाती। जिसकी कड़ियां आध्यात्मिक हैं। मोजेज उसके बाहरी आवरण को ही पकड़ पाए हैं, जो बेहद चलताऊ ढंग से फिल्मी है। जिसमें एक छोटे शहर का छंटे किस्म लड़का कैसे ऊंचाइयां छूने के लिए चालाकियां करता है।

कहानी में ईंट भट्ठे से उठ कर बना एक रईस बिल्डर है, उसकी चंचल पत्नी है और एक बेटा भी। जिसे बिल्डर बिल्कुल प्यार नहीं कर पाता क्योंकि वह उसका है ही नहीं! फिल्म अपनी शुरुआत में सोच-समझ की राह पर चलती हुई अंततः नादानी के गड्ढे में गिर जाती है। इन बातों के बावजूद मोजेज में संभावनाएं दिखती हैं और उनकी अगली फिल्म का इंतजार रहेगा।
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जुबान का एकमात्र सकारात्मक पक्ष विक्की कौशल

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जुबान का एकमात्र सकारात्मक पक्ष विक्की कौशल हैं, जिनका अभिनय सधा हुआ है। हालांकि इससे पहले मसान में उनके भावों की तीव्रता ज्यादा प्रखर थी। दिलशेर के रोल में वह अपनी महत्वाकांक्षाओं को छुपाते हुए करियर में उभरने का एहसास करा जाते हैं।

उन्होंने पंजाबी लहजे को अच्छे ढंग से पकड़ा है और हकलाहट को भी। सारा जेन डायज यहां किसी आवारा हवा-सी इधर-उधर गीत गाने के लिए ही थीं। वह काम उन्होंने किया। मगर प्रभावित नहीं कर पातीं। उनके चेहरे पर भाव नहीं उभरते।

न ही उनकी बॉडी लैंग्वेज कुछ कहती है। बिल्डर/सख्त पिता बने मनीष चौधरी असर छोड़ते हैं। संगीत इस फिल्म का अहम हिस्सा है, मगर कहीं भी छू नहीं पाता। यह जुबान की बड़ी कमजोरी है।
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