फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या सिटी लाइट्स चमका देगी किस्मत?

Thu, 29 May 2014 12:35 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, मुंबई
विज्ञापन
विज्ञापन
फिल्म और विज्ञापन की दुनिया में पत्रलेखा को पहले अन्विता पॉल के नाम से जाना जाता था। लेकिन निर्माता मुकेश भट्ट और महेश भट्ट ने कहा कि वह अपना मूल नाम ही फिल्मों में रखें। पत्रलेखा की कवयित्री दादी ने यह नाम रखा था। शुक्रवार को रिलीज हो रही ‘सिटी लाइट्स’ से पत्रलेखा बॉलीवुड में कदम रख रही हैं। उनसे जीवन और कैरियर को लेकर बातचीत की लिपिका वर्मा ने...
विज्ञापन


सफर मुंबई का
मैं साधारण परिवार से हूं और मेरे पिता सीए हैं। वह चाहते थे कि मैं भी उनके नक्शे कदम पर चलूं। लेकिन मैंने बोर्डिंग स्कूल में जाने के बाद अपने लिए नए कैरियर की तलाश शुरू कर दी। मैं कक्षा छह तक शिलांग में पढ़ी थी। उसके बाद असम चली गई। मेरा एक छोटा भाई और एक बहन है।

बोर्डिंग स्कूल में मैं बास्केटबॉल, स्विंग और हॉर्स राइडिंग जैसे खेल खेलती थी। वहां मैंने डांस सीखा और नाटकों में भी हिस्सा लेना शुरू किया। पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था। मैं अच्छी स्टूडेंट नहीं थी। पढ़ाई खत्म करके मैं मुंबई आ गई और यहां कुछ विज्ञापनों में काम किया।
विज्ञापन


उस वक्त मेरे लिए 15 हजार रुपये बहुत होते थे। धीरे-धीरे मेरे विज्ञापनों ने मुझे पहचान दिलाई और कास्टिंग डायरेक्टर मेरे पास आने लगे। मैंने बैरी जॉन की क्लासों में अपनी ऐक्टिंग को निखारा। एक दिन मुझे ‘सिटी लाइट्स’ के ऑडिशन का बुलावा आया और मैं उसमें चुन ली गई।

चुनौतियां थी सामने
‘सिटी लाइट्स’ में रोल मिलने के बाद मुझे और राजकुमार को राजस्थान में रहना पड़ा। हमने वहां की भाषा, स्थानीय लोगों के हाव-भाव वगैरह सीखे। चूंकि हम असल जिंदगी में भी साथ हैं, इसलिए लोगों को लगता है कि रील लाइफ में साथ होने पर सहज रहेंगे। लेकिन ऐसा नहीं था। पर्दे पर हमारी शादीशुदा जिंदगी में बहुत सारा उतार-चढ़ाव है, जबकि वास्तविक जिंदगी ऐसी नहीं है। ऐसे में खुद को रोल के हिसाब से ढालने की चुनौती हमारे सामने थी, जिसे हमने स्वीकार किया और अपना सर्वश्रेष्ठ परफॉरमेंस दिया।

ग्लैमरविहीन रोल
पहली ही फिल्म में ग्लैमरविहीन रोल करना सोचा-समझा फैसला नहीं था। सच तो यह है कि किरदार ही उस तरह का है। एक राजस्थानी गांव में रहने वाली महिला कैसे फैशनेबल होगी। वैसे भी मैंने इस बारे में ज्यादा नहीं सोचा क्योंकि भट्ट कैंप अगर आपको लॉन्च कर रहा है तो यह सपना सच होने से कम नहीं हो सकता। मैं कुछ अलग ढंग से सोचती हूं। मुझे लगता है कि फिल्म में लोगों को मेरा परफॉरमेंस देखने के लिए आना चाहिए। अगर उन्हें मेरी ऐक्टिंग अच्छी लगती है तो सराहना करनी चाहिए, न कि इस बात के लिए कि मैं कितनी ग्लैमरस दिखती हूं। अगर मुझे मेरी अगली फिल्म में भी ऐसा ही ग्लैमरविहीन अच्छा रोल मिलता है तो मैं जरूर करूंगी।

बोल्ड सीन की मुश्किल
फिल्म में दो-एक बोल्ड सीन हैं, लेकिन वे फिल्म का जरूरी हिस्सा हैं। इन दृश्यों से फिल्म की कहानी में जान पड़ती है। मुझे ऐसे दृश्य करने में कोई पूर्वाग्रह नहीं था। हंसल सर (निर्देशक) ने बहुत खूबसूरती से ये दृश्य मुझे और राजकुमार को समझाए थे। हम भी जानते थे कि फिल्म के लिए ये सीन जरूरी हैं। वैसे इस बात से इंकार नहीं करूंगी ये दृश्य करना मेरे लिए आसान नहीं था। शूटिंग के दौरान कई लोग सेट पर होते हैं और बड़े पर्दे पर लाखों लोग इन्हें देखते हैं। लेकिन बोल्ड सीन को शूट करते वक्त डीओपी, हंसल सल और साउंड रिकॉर्डिस्ट ही सेट पर थे।

रीयल कपल होने की मुश्किलें
अगर आप असल जिंदगी में बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड हैं तो पर्दे पर पति-पत्नी का रोल निभाना आसान नहीं होता। वह भी तब जबकि पर्दे पर आपके रिश्ते सहज नहीं दिखाए जा रहे और उनमें बहुत सारी मुश्किलें हों। ‘सिटी लाइट्स’ के पति-पत्नी का रिश्ता साधारण नहीं है। वे जिंदगी के कठिनतम दौर से गुजर रहे हैं। मुझे और राजकुमार को उन परिस्थितियों को समझ कर खुद को उनमें डुबो देना होता था। ऐसे में ऐक्टिंग अग्निपरीक्षा की तरह हो जाती थी।

विद्या मेरी प्रेरणा
विद्या बालन मेरी प्रेरणा हैं। मैं ‘परिणीता’ के दिनों से उनका काम बहुत बारीकी और गंभीरता से देख रही हूं। 2005 में इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और इसके बाद उन्होंने ‘पा’, ‘इश्किया’, ‘द डर्टी पिक्चर’ और ‘कहानी’ जैसी फिल्में की। मैं उनके जैसी ही ऐक्टर बनना चाहती हूं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें