अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम करने वाले खतरनाक सीरियल किलर ठग बेहरम की कहानी बेहद खौफनाक है। इसे दुनिया का सबसे खूंखार हत्यारा करार दिया गया था।
कहा जाता है कि उसके बनाए गैंग ने एक के बाद एक करीब 931 लोगों का गला घोंट कर उनकी हत्या कर दी थी। 1790 से 1830 के बीच करीब 40 साल तक उसका जबरदस्त आतंक रहा है।
इस अपराधी की एक खास पहचान थी, उसका पीला रुमाल। जिसके जरिए वह लोगों का गला घोंट देता था। वह एक ठग गैंग का सरगना था।
सैकड़ों हत्याएं करने के बाद भी उस पर कोई केस नहीं चला और न ही उसके खिलाफ कोई सबूत मिला। उस पर जब भी कोई आरोप लगा उसकी गैंग के साथियों ने आगे आकर वह अपराध अपने सिर पर ले लिया और वह बचता रहा।
गिनीज बुक में शामिल है ये रिकॉर्ड
1765 में जन्मे इस कातिल ने अपना पहला अपराध महज 25 साल की उम्र में वर्ष 1990 में किया। इसके बाद शुरू हुआ हत्याओं का सिलसिला इसने करीब 40 साल तक जारी रखा और इस दौरान इसने अपना गैंग भी बना लिया।
मध्य प्रदेश के कटनी जिले में इस गैंग का आतंक इतना था कि अंग्रेजी हुहूमत भी हिल गई। बेहरम के गिरोह जो 931 हत्याएं की उसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया।
आखिरकार बेहरम के गैंग को खत्म करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन को विशेष रूप से भेजा। बाद में कटनी का एक कस्बा हेनरी के उपनाम स्लीमनाबाद के नाम से जाना जाने लगा।
कर्नल स्लीमन ने जब स्लीमनाबाद में अपनी छावनी बनाई तब भी इन ठग गिरोहों को खत्म करना आसान नहीं था, लेकिन स्लीमन ने भी हार नहीं मानी और उसने अपनी एलआईबी पुलिस बनाकर न सिर्फ इन्हें पकड़ने में कामयाबी हासिल की बल्कि सै़कड़ों ठगों को मौत के घाट उतार दिया।
चार चरणों में करते थे लोगों की हत्या
मध्य भारत के ठगों के कारनामे हमेशा से चर्चा में रहे हैं। ये ठग कई चरणों में ठगी को अंजाम देते थे। पहले चरण में ठगों की टोली जंगलों में यात्रियों के समूहों का जायजा लेती थी और यह परखती थी कि किस टोली में यात्रियों के पास ज्यादा सामान है। लोगों को परखने के बाद ये जानवरों की आवाजें निकालकर दूसरी टोली को आगाह करते थे।
जिसके बाद लुटेरों की दूसरी टीम यात्रियों के साथ घुल-मिल जाती थी और साथ में खाना खाने के बाद सोते थे। इस दौरान यह भी पता करते थे कि किन-किन यात्रियों के पास सोना है।
इसके बाद तीसरी टोली आकर उन यात्रियों को पूरी तरह से लूट लेती थी। इस टोली के ठग साथ में खाकी या पीले रंग का रुमाल रखते थे, जिससे यात्रियों का गला घोंट दिया जाता था। चौथी टीम यात्रियों की लाशों को कब्रों में दफना देती थी। इन गिरोहों का आतंक करीब दो शताब्दी तक था।
अभी भी मौजूद है वो पेड़!
कर्नल स्लीमन के एनआईबी तंत्र ने एक-एक करके ठगों का सफाया किया और उनमें से सैकड़ों को फांसी भी दी गई। कुछ लोगों का कहना है कि स्लीमनाबाद थाने में लगा पीपल पेड़ वहीं है जिस पर ठगों को फांसी दी जाती थी।
हालांकि बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि वह पेड़ असली नहीं है। स्लीमनाबाद थाना का पुराना भवन कर्नल स्लीमन की चौकी माना जाता है। यहां स्लीमन की याद में एक स्मारक बनाया गया है। साथ ही दीवार पर इस बात का भी जिक्र किया गया है कि स्लीमनाबाद की स्थापना कैसे हुई।
बहुत से लोग अभी भी मानते हैं कि एमपी की पुलिस स्लीमन के नक्शे कदम पर ही काम करती है।