पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट।
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2002 में कांग्रेस में शामिल हुए
पिता राजेश पायलट के जन्मदिन 10 फरवरी 2002 में सचिन कांग्रेस में शामिल हुई। इसी साल 11 जून को राजेश पायलट की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। यहां से पायलट की जिंदगी में बड़ा मोड़ आया और फिर उनका सियासी सफर शुरू हो गया। दो साल बाद 2004 में वह दौसा से सांसद चुने गए। इस समय सचिन पायलट की उम्र सिर्फ 26 साल थी। इस दौरान वह गृह मामलों पर लोकसभा की स्थायी समिति के सदस्य भी बनाए गए। 2006 में वह नागरिक उड्डयन मंत्रालय में सलाहकार समिति के सदस्य भी बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में पायलट भाजपा उम्मीदवार किरण माहेश्वरी को हराकर अजमेर से सांसद बने। 2012 में मनमोहन सरकार में पायलट को संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी केंद्रीय मंत्री बनाया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव की मोदी लहर में पायलट अपनी अजमेर सीट नहीं बचा पाए और चुनाव हार गए।
लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश में हुए एक्टिव
2014 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद सचिन पायलट राजस्थान की राजनीति में सक्रिय हुए। 2018 विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। कहा जाता है कि पार्टी को प्रदेश में एक बार फिर खड़ा करने के लिए पायलट ने बहुत मेहनत की। दावा किया जाता है कि 2018 के चुनाव से पहले पायलट ने करीब साढ़े पांच लाख किमी. की यात्रा कर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया और पार्टी को भाजपा के मुकाबले में ला दिया था। ऐसे में यह भी कहा जाने लगा कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री सचिन पायलट ही होंगे। चुनाव बाद कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन टोंक विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक बने पायलट सीएम नहीं बन पाए। कांग्रेस आलाकमान ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया और पायलट को उप मुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा।
सचिन पायलट, कांग्रेस नेता
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सियासी जीवन की सबसे बड़ी बगावत
2018 के विधानसभा चुनाव से शुरू हुई अशोक गहलोत और सचिन पायलट की अदावत सरकार बनने के बाद भी नहीं थम रही थी। पार्टी में विधायकों के दो गुट हो गए थे। एक गुट पायलट के साथ था तो दूसरा गहलोत के साथ था। धीरे-धीरे दोनों नेताओं के बीच की खाई बढ़ती गई। जुलाई 2020 में पायलट ने बगावती तेवर दिखा दिए। वह विधायकों को लेकर हरियाणा के मानेसर चले गए। इस दौरान लंबा सियासी घटनाक्रम चला। गहलोत अपनी सरकार बचाने में सफल हो गए, लेकिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया। 14 जुलाई 2020 के बाद से पायलट सिर्फ एक विधयाक की भूमिका हैं। अब एक बार फिर उनके मुख्यमंत्री बनने की चर्चा हो रही है। हलांकि, गहलोत आज भी उनके विरोध में बताए जा रहे हैं।
पिता ने भी कांग्रेस को दिखाए थे बागी तेवर
राजनीति गलियारों में सचिन पायलट अपने कमिटमेंट और बगावती तेवर के लिए जाने जाते हैं। उन्हें लेकर चर्चा होती है कि पायलट को यह बगावती तेवर अपने पिता से विरासत में मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 1997 में सचिन पायलट के पिता ने भी बगावत दिखाई थी। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव बागी तेवर दिखाते हुए लड़ा था। वहीं, नवंबर 2000 में जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ा था। इस दौरान भी पर राजेश पायलट ने जितेंद्र प्रसाद का खुलकर समर्थन किया था।
राजनीति सोने का कटोरा नहीं
राजनीति में आने को लेकर एक बार मीडिया से बात करते हुए पायलट ने कहा था, पिता से मैंने कभी अपने राजनीतिक सफर के बारे में बात नहीं की, लेकिन उनके निधन के बाद जिंदगी एकदम बदल गई थी। इसके बाद मैंने सोच-समझकर राजनीति में आने का फैसला किया। राजनीति मेरे ऊपर थोपी नहीं गई है, मैंने जो कुछ भी सीखा उसके दम पर सिस्टम में एक बदलाव लाना चाहता हूं। पायलट ने कहा था, राजनीति कोई सोने का कटोरा नहीं है, जिसे कोई आगे बढ़ा देगा। इस क्षेत्र में आपको अपनी जगह खुद बनानी होती है.।