मौजूदा बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के लिए उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने 14,377 करोड़ रुपए आवंटित किए। पिछले वित्त वर्ष में स्वास्थ्य के मद में खर्च की गई राशि से यह राशि 34 फीसदी ज्यादा थी।
बढ़ोतरी के बाद भी प्रदेश सरकार सरकारी अस्पतालों में भरोसा जगाने में नाकामयाब रही है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आम आदमी निजी अस्पतालों को ही तरजीह देता है।
अमर उजाला के लिए किए गए हंसा रिसर्च के सर्वे के आंकड़ों को उत्तर प्रदेश का आईना मानें, तो पाएंगे कि सूबे में 67 फीसदी लोग जरूरत पड़ने पर सरकारी के बजाए निजी अस्पतालों में जाते हैं।
बरेली प्रदेश का ऐसा शहर है, जहां 82 फीसदी प्रतिभागियों ने माना कि वे निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं। प्रदेश की राजधानी लखनऊ की भी कुछ ऐसी ही हालात है। शहर के 69 फीसदी प्रतिभागियों ने निजी अस्पतालों पर भरोसा जताया जबकि 31 फीसदी ने कहा कि वह सरकार अस्पतालों की शरण में जाते हैं। सरकारी अस्पतालों का ये चुनाव मजबूरी भी हो सकता है।
हंसा रिसर्च के सर्वे में 11 शामिल शहरों के 32 फीसदी लोग सरकारी अस्पताल में इलाज कराते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से हैं।
सरकारी अस्पताल के मामले में गोरखपुर, अलीगढ़ और वाराणसी जैसे शहरों की हालत बेहतर कही जा सकती है। हालांकि कानपुर, मेरठ, लखनऊ, आगरा और मुरादाबाद में निजी अस्पतालों की पूछ अधिक है। निजी अस्पतालों को पसंद करने का बड़ा कारण उनकी सेवाओं से संतुष्टि है।
हंसा रिसर्च के सर्वे में सामने आया कि इलाज का सवाल हो, दवाओं की उपलब्धता, डॉक्टरों और नर्सों का सहयोग या पीने का पानी, सफाई, टॉयलेट्स का सवाल हो, निजी अस्पताल सभी मानदंडों पर सरकारी से बेहतर हैं। मगर इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है।