चंडीगढ़ एक खूबसूरत शहर है। इसके खुशनुमा माहौल में बैठकर लेखन करने का अपना ही एक मजा है। मैं चंडीगढ़ आकर बहुत खुश हूं।
यह कहना है लिटरेचर फेस्ट में शामिल होने के लिए सिटी ब्यूटीफुल पहुंचे बॉलीवुड कलाकार पीयूष मिश्रा का। पीयूष मिश्रा एक एक्टर, म्यूजिक डायरेक्टर, गीतकार, गायक और स्क्रिप्टराइटर हैं। जिनके अभिनय से लेकर गीत तक की सभी दाद देते हैं।
अपनी जिंदगी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें बताते हुए उन्होंने कहा कि मैं अब थिएटर से थक चुका हूं। अब थियेटर करने का बिल्कुल मन नहीं करता...फिल्में ही काफी हैं...किसी के लिए गीत लिखता हूं तो किसी में अभिनय....क्या करूं समय भी कम ही है।
चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल के लिए जब आमंत्रित किया गया तो काफी अच्छा लगा। ऐसे फेस्ट नई रचना और नए लेखन को जन्म देते हैं।
उनकी खूबी है कि इतनी सारी महारत होते हुए भी कभी कनफ्यूज नहीं होते। खुद पीयूष बताते हैं कि दस साल पहले वह थिएटर में काम करते थे और फिल्मों में चले गए।
अभी भी सीमाएं बंधी नहीं....आगे कुछ भी हो सकता है....पीयूष के शब्दों में कोई भविष्य नहीं जानता। पीयूष कहते हैं कि अब वह थक चुके हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसा महसूस किया है कि जीवन न जाने कहां से आए और कहां ले जाए। इसीलिए जिंदगी को वह इसको फिलास्फिकल ढंग से नहीं बल्कि लाजिकल ढँग से जीते हैं।
पीयूष मिश्रा ने कहा कि मैं चीजों को अपने ढंग से देखता हूं। यह मेरा काम करने का स्टाइल है। उन्होने कहा कि काफी काम किया और वही काम उनकी पहचान बन गया है। जिंदगी को पीयूष की नजरों से देखें तो काफी संघर्ष है।
वह कहते हैं कि फिल्म मेकिंग के लिए लिट्रेरी फेस्ट जरूरी है। फिल्मों के लिए यह सबसे आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अब सारा जमाना प्रमोशन का है। क्योंकि यहां कामोडिटी कल्चर है।
पीयूष मिश्रा ने लिटरेचर फेस्ट की शाम को चंडीगढ़ के होटल ताज में एक छोटी सी परफारमेंस भी दी। उन्होंने कहा कि 1983 में एनएसडी में पहुंचे तो जरूर लेकिन ऐसा कभी लगता नही था कि वह यहाँ आएंगे। पीयूष ने कहा जिंदगी काफी अलग है। वर्ष 2005 ब्रेकिंग इयर था जिसमें जिंदगी पूरी तरह से बदल गई।
लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंचे बॉलीवुड की जानी मानी हस्ती पीयूष मिश्रा का काम करने का अलग ही अंदाज है। पहले थियेटर किया, उसके बाद फिल्में। किसी फिल्म के लिए गीत लिखते हैं तो किसी में खुद अभिनय भी करते है।
खुद को कभी सीमाओं में बांधकर नहीं रखा। मिश्रा के अनुसार लिटरेचर फेस्टिवल नई रचना और नए लेखन को जन्म देते हैं। पीयूष कहते हैं, जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है। न जाने कहां ले जाए?। इसीलिए वे जिंदगी को फिलॉस्फिकल ढंग से नहीं, बल्कि लॉजिकल ढंग से जीते हैं। उन्होंने माना कि फिल्म मेकिंग के लिए लिटरेरी फेस्ट जरूरी हैं।
फिल्मों के लिए यह सबसे आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कॉमोडिटी कल्चर होने के कारण अब सारा खेल प्रमोशन का है। लिटरेचर फेस्ट में शाम को चंडीगढ़ के होटल ताज में उन्होंने एक छोटी सी परफारमेंस भी दी। 1983 में जब एनएसडी में पहुंचे तो उन्होंने यह नहीं सोचा था कि वे इस स्टेज तक पहुंच जाएंगे। वे 2005 को अपना ब्रेकिंग ईयर मानते हैं।
फिल्में: भारत एक खोज, सरदार, दिल से, समुरई, मकबूल, बटरफ्लाई, एक दिन चौबीस घंटे, मातृभूमि, दीवार, झूम बराबर झूम, गुलाल, लाहौर, तेरे बिन लादेन, लफंगे परिंदे, भिंडी बाजार, दैट गर्ल इन यलो बूट्स, ऑटो रिक्शा ड्राइवर, रॉकस्टार, गैंग्स ऑफ वासेपुर
गाने: दिल पे मत ले यार, ब्लैफ फ्राइडे, अजा नचले, टशन, गुलाल, चल चलें, हुस्ना, जलपरी