प्रो. डीएस चौहान
पूर्व कुलपति उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय
चार साल आठ माह के कार्यकाल में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय को अलग पहचान दिलाने वाले प्रो. डीएस चौहान ने शासन की ओर से सहयोग न मिलने पर दुख जताते हुए साफ किया कि प्रदेश में एक्सीलेंस की समझ ही नहीं है। पेश हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश -
शासन के साथ टकराव के हालात लगातार बने रहे।
जवाब : यहां एक्सीलेंस की समझ ही नहीं है। नेताओं की तरह आईएएस अधिकारियों की सोच भी छोटी होती जा रही है। शासन के कुछ अधिकारी केवल अपने इर्दगिर्द ही सबकुछ रखते हैं, जिसका खामियाजा प्रदेश के युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। मैं जो करना चाहता था, मुझे वह करने नहीं दिया गया।
विवि की कार्यप्रणाली में क्या परिवर्तन महसूस किए।
जवाब : मैं वर्ष 2009 में यहां आया था तो विवि की परीक्षा प्रणाली महज एक कालेज के इर्दगिर्द चलती थी। चार साल का वक्त लगा है विवि को अलग पहचान दिलाने में। सरकार जिस तेजी से शिक्षा का निजीकरण कर रही है, उससे तो कई बार ऐसा लगा कि कहीं विवि का अस्तित्व ही संकट में न जाए।
क्या कसक रह गई है।
जवाब : मैं इस विवि को एक शोध विवि के तौर पर स्थापित करना चाहता था। मेरे पास 100 करोड़ रुपये की ऐसी योजना थी, जिसके तहत आने वाले देश विदेश के विशेषज्ञ प्रोजेक्ट के खर्च पर ही यहां के युवाओं को शिक्षा की नई रोशनी दे सकते थे। लेकिन हालातों के साथ न देने के चलते मैं यह नहीं कर पाया। अब मैं इस योजना को निजी विवि में अमल में लाऊंगा तो देखना एक दिन यह योजना कितना रंग दिखाएगी।
राज्यपाल ने भी शासन और सरकार के विवि में बेवजह हस्तक्षेप पर चेताया है।
जवाब: जी हां, महामहिम राज्यपाल भी इस बाबत सरकार को चेता चुके हैं। इससे पहले भी एक कुलपति हस्तक्षेप के कारण ही इस्तीफा दे चुके हैं। जिस आईएएस अधिकारी के साथ सबसे ज्यादा तनाव रहा, उन्होंने सम्मान तो पूरा दिया लेकिन सपोर्ट नहीं किया। शायद यही वजह है कि मैं विवि को जहां देखना चाहता था, वहां नहीं देख पाया। मैंने अपने चार साल के कार्यकाल से संतुष्ट नहीं हूं, लेकिन इतना किया है कि और लोग संतुष्ट हो जाएंगे।
अब अगली पारी के बारे में क्या कहेंगे।
जवाब : मैं वाराणसी के एक निजी विवि में कुलपति का पदभार ग्रहण करने जा रहा हूं। इसके साथ ही एसोसिएशन आफ इंडियन यूनिवर्सिटी की अहम जिम्मेदारी भी संभालनी है। मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि अगले जन्म में एक सेवा प्राणी के तौर पर ही जन्म दे।
काश! यूपी जैसे होते अधिकारी
अपने कार्यकाल में शासन के अधिकारियों की मनमानी की वजह से परेशान रहने वाले प्रो. चौहान का कहना है कि जब वह उत्तर प्रदेश तकनीकी विवि के कुलपति थे तो उस वक्त वहां के सीनियर अधिकारी न केवल उनका सम्मान करते थे बल्कि पूरा सहयोग भी करते थे।
वे कहते हैं-मैंने यहां यूपी से ज्यादा कोशिश की लेकिन अधिकारियों का सपोर्ट न होने की वजह से प्रयास परवान नहीं चढ़ पाए। मुझे इस बात की भी कसक है कि कुलसचिव सहित तमाम अहम पद अस्थाई हैं। मैं उन्हें सभी को परमानेंट देखना चाहता था।