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'मैदान पर जाने से था लोगों को ऐतराज'

Fri, 09 Aug 2013 11:03 AM IST
अंशुल डांगी
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वंदना कटारिया
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हॉकी प्लेयर

रोशनाबाद, हरिद्वार जिले का यह छोटा सा कस्बा आज रोशन है। यहां की एक बिटिया न सिर्फ जूनियर महिला हॉकी विश्व कप में भारतीय टीम का हिस्सा बनी, बल्कि टूर्नामेंट में गोल दागने के मामले में उसने विश्व की तीसरे नंबर की खिलाड़ी होने की उपलब्धि भी हासिल की।

उत्तराखंडी होने पर पूरा गर्व
वंदना के गोलों का ही दम रहा कि भारतीय टीम कांस्य अपनी झोली में डाल सकी। लेकिन, वंदना की कामयाबी की यह राह इतनी आसान नहीं रही। रोशनाबाद आज भले वंदना की वजह से देश-दुनिया में पहचाना जा रहा हो लेकिन एक वक्त था, जब यहां के लोगों को एक लड़की का हाकी स्टिक लेकर मैदान पर उतरना कतई सुहाता नहीं था। वह तो पिता और कोच का साथ रहा कि वंदना अपना सपना साकार कर सकी।
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दूसरी ओर, उत्तराखंड का सिर ऊंचा करने वाली इस खिलाड़ी को भले ही उत्तराखंडी होने पर पूरा गर्व हो, लेकिन राज्य सरकार की नजरें अब तक उस पर नहीं गई हैं। अमर उजाला ने वंदना कटारिया से उनकी कामयाबी, शुरुआती जीवन और भविष्य की योजनाओं पर बातचीत की:

सवाल: हॉकी में इतिहास रचकर आप युवा खिलाड़ियों के लिए रोल मॉडल बन गई हैं। लोगों की अपेक्षाएं आपसे बढ़ी हैं, इससे क्या कोई दबाव महसूस कर रही हैं?
जवाब: मैं छोटे से गांव से निकलकर आई हूं। इस कामयाबी के बाद लोगों का बहुत प्यार और सम्मान मिल रहा है। रोल मॉडल होना तो बहुत बड़ी बात है, मुझे अभी बहुत सीखना है। दबाव नहीं है, बस इतना ही कहूंगी कि लड़की समझकर बेटी को खेलने से मत रोकिए, बल्कि प्रेरित करने पर वो हर किसी को गौरवान्वित करेगी।

सवाल: इंग्लैंड के खिलाफ कांस्य पदक के लिए हुए अहम मुकाबले में आप गोल करने से चूक गईं, दिमाग में क्या चल रहा था?
जवाब: मैंने इससे पहले के मैचों में गोल किए थे, तो खुद पार भरोसा था। इंग्लैंड की गोलकीपर ने बेहतरीन बचाव किया। गोल न कर पाने से मुझे बहुत निराशा हुई, लेकिन जीत का पूरा भरोसा था।

सवाल: टूर्नामेंट का सबसे यादगार पल क्या रहा, ऐसी कौन सी ख्वाहिश है जिसे पूरा करना चाहती हों?
जवाब: जूनियर हॉकी विश्व कप में कांस्य पदक जीतना मेरी जिंदगी का अब तक का सबसे यादगार पल है। मेरे पिता नाहर सिंह कटारिया और कोच कृष्ण कुमार का सपना है कि मैं वर्ल्ड नंबर वन बनूं और ओलंपिक में टीम को स्वर्ण पदक जितवाऊं। बस अब इस सपने को पूरा करना मेरा लक्ष्य है।

सवाल: सफलता की पहली खुशी किसके साथ बांटी, घर से किस तरह का रिस्पांस मिला?
जवाब: मैंने अपने कोच और गुरु कृष्ण कुमार को सबसे पहले फोन किया। इसके बाद मां-पिता से बात की। परिजन मेरे लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। मुझे भी उनसे मिलने का बहुत मन है, जल्द ही मैं घर आऊंगी।

सवाल: रोशनाबाद से राष्ट्रीय टीम तक का सफर कैसे पूरा किया, किस तरह की परेशानियां हुईं?
जवाब: जब मैंने हॉकी खेलना शुरू किया, माहौल अच्छा नहीं था। लोग पिताजी और भाइयों से कहते कि लड़की को ऐसे बाहर नहीं निकलना चाहिए। कुछ समय खेलना भी छोड़ा, लेकिन पिताजी ने हमेशा साथ दिया। मुझे खेल का सामान लाकर दिया और जरूरतें पूरी कीं। दस साल पहले लखनऊ हॉस्टल जाने के बाद पिताजी ने उधार लेकर मेरी जरूरतों को पूरा किया। आखिर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंची तब जाकर लोगों के मुंह बंद हुए।
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सवाल: उत्तराखंड सरकार ने कभी प्रोत्साहित किया खेल के लिए, कभी कोई सम्मान मिला?
जवाब: मुझे उत्तराखंडी होने पर गर्व है, लेकिन सरकार ने न तो मुझे और न ही मेरे परिवार को कोई सम्मान दिया। शायद सरकार को ये पता भी नहीं कि मैं उत्तराखंड से हूं। टीम में शामिल दूसरी खिलाड़ियों के राज्यों की सरकार ने उन्हें सम्मानित करने की घोषणा की है, लेकिन मुझे सम्मान तो दूर बधाई संदेश तक नसीब नहीं हुआ है। सरकारी उपेक्षा के कारण ही मुझे उत्तराखंड छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है (वंदना वर्तमान में रेलवे के लिए खेलती हैं)।
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