चिकित्सा शिक्षा को पर्वतीय राज्य के अनुरूप दशा और दिशा देना ही हेमवंती नंदन बहुगुणा चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति पद डॉ. मोहन चंद्र पंत की प्राथमिकता है।
कैंसर उपचार में अहम योगदान
कैंसर उपचार के क्षेत्र में कई शोध और अनुसंधान कर चुके डॉ. पंत की कर्मस्थली भले लखनऊ रही है, लेकिन राज्य गठन से पूर्व भी उन्होंने कुमाऊं गढ़वाल में कैंसर उपचार सेवाओं और सुविधाओं की नींव रखने में अहम योगदान दिया।
पदम श्री और डॉक्टर बीसी राय अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. पंत नई जिम्मेदारी को चुनौती के साथ एक अवसर मानते हैं जिससे उन्हें अपनी जन्मभूमि (रानीखेत) को कुछ वापस कर कर्ज उतारने का मौका मिला है।
प्रश्न : राज्य में चिकित्सा सेवाओं और चिकित्सा शिक्षा को किस तरह आंकते हैं?
डॉ. पंत : राज्य में चिकित्सा क्षेत्र में मानव संसाधन की कमी है, जिसका असर पर्वतीय क्षेत्रों में पड़ रहा है। इस कमी को दूर करने के लिए चिकित्सा शिक्षा को न केवल बेहतर बल्कि संसाधन संपन्न भी करना होगा। नए मेडिकल कॉलेज खोलने के साथ मौजूदा कॉलेजों में व्यवस्था को सुधारने पर जोर देना होगा।
प्रश्न : चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में आपके पुराने अनुभव कितने कारगर होंगे?
डॉ. पंत : किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज में सेवाएं देने से कैरियर शुरू करने के बाद डॉ. मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस स्थापित करने का अनुभव है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट को तीन बरस में स्थापित कर वहां चिकित्सा शिक्षा के एमडी, डीएम और एमसीएच शुरू करवा दिए थे। लेकिन यहां चिकित्सा शिक्षा को जीरो से शुरू करना एक बड़ा चैलेंज है।
प्रश्न : चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में क्या बदलाव किये जाने जरूरी हैं?
डॉ. पंत : मेडिकल कॉलेजों में फैक्लटी बढ़ाने से लेकर चिकित्सा शिक्षा में परीक्षा और मूल्यांकन पेट्रन को नए सिरे से खड़ा करना पड़ेगा।
चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान परक शिक्षा बेहद जरूरी है। छात्रों की रुचि रिसर्च में पैदा करना और उसके लिए संसाधन उपलब्ध करवाना एक विश्वविद्यालय का दायित्व है।
प्रश्न : राज्य में चिकित्सा क्षेत्र में बदलाव के लिए क्या टारगेट लेकर चल रहे हैं?
डॉ. पंत : अभी यह कहना जल्दबाजी होगी। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में नतीजे कुछ दिनों या महीनों में नहीं बदलते। नतीजे 10 से 15 वर्ष में सामने आते हैं, जब चिकित्सा सेवाओं में डॉक्टरों की संख्या बढ़ने के साथ सेवाओं का स्तर बेहतर होता है।