दो शताब्दी पुरानी इतिहास की अनूठी धरोहर किले का परकोटा आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करता नजर आ रहा है। देश की आजादी से लेकर अब तक इस पुरातात्विक संपदा को सहजने के लिए सरकार को कोई महकमा आगे नहीं आया है। दीवार को ढहाकर लगातार कब्जे किए जाते रहे। अब तो नगर निगम ने ही इसके एक हिस्से को गिरा दिया है।
पुराने शहर के चारों ओर फैला किले का परकोटा इतिहास की अनूठी विरासत है। सन 1796 से 1814 के बीच इसका निर्माण हुआ था। 1857 की गदर में फिरंगी सेना के सामने यह परकोटा झांसी की जनता की ढाल बनकर खड़ा रहा था। लेकिन, अब अपने ही इसे छलनी कर रहे हैं। दरअसल, परकोटे के संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार के किसी विभाग ने नहीं उठा रखी है। केंद्रीय पुरातत्व विभाग किले को तो संरक्षण में लिए हुए है, लेकिन किले के इस हिस्से को भगवान भरोसे छोड़ रखा है। राज्य पुरातत्व विभाग का भी इससे कोई सरोकार नहीं है।
शहर में विकास का काम करने वाले सरकारी विभाग नगर निगम और झांसी विकास प्राधिकरण भी इसकी जिम्मेदारी से कन्नी काटे हुए हैं।
इसी का नतीजा है कि परकोटे का स्वरूप लगातार खुर्दबुर्द होता जा रहा है। जगह-जगह इस पर कब्जा कर मकान बना लिए गए हैं। वहीं, कुछ स्थानों पर ये देखरेख के अभाव में ध्वस्त भी हो चुका है। अब तो नगर निगम ने ही नाला निर्माण के लिए भांडेरी गेट के पास इसके एक हिस्से को ढहा दिया है।
डीएम ने दिए जांच के आदेश
झांसी। अमर उजाला के मंगलवार के अंक में ‘अंग्रेज ने नहीं, नगर निगम ने ढहा दिया झांसी का परकोटा’ शीर्षक से प्रकाशित खबर में नगर निगम की करतूत उजागर की गई थी। खबर में खुलासा किया गया था कि इतिहास की इस विरासत को भांडेरी गेट के पास नगर निगम ने नाला निर्माण के लिए ढहा दिया। इस मामले में जिलाधिकारी शिवसहाय अवस्थी का रुख गंभीर है। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच बैठा दी है। जांच की जिम्मेदारी नगर मजिस्ट्रेट को सौंपी है। किन परिस्थितियों में इतिहास की ये विरासत ढहाई गई, इसके लिए कौन है जिम्मेदार, इन सारे बिंदुओं पर जांच होगी।