शहर में कूड़ा निस्तारण करने वाली एटूजेड कंपनी ने सरेंडर कर दिया है। अब कचरा निस्तारण की जिम्मेदारी इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंस सर्विसेस (आईएलएफएस) को सौंपने की तैयारी की जा रही है।
एटूजेड का पावर प्लांट आईएलएफएस ने अधिगहीत कर लिया है। आईएलएफएस ने एटूजेड के संसाधनों का सर्वे करवा लिया है। इसके बाद माना गया है कि डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन से लेकर निस्तारण तक पूरी क्षमता से करने के लिए कर्मचारियों के साथ ही 20 करोड़ रुपये की जरूरत है।
इसके लिए लोन लिया जा रहा है। उधर, प्रदेश के मुख्य सचिव 18 दिसंबर को यहां आकर कचरा प्रबंधन का जायजा लेंगे।
गुड़गांव (हरियाणा) बेस्ड कंपनी एटूजेड ने 16 अक्तूबर 2010 को शहर में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन शुरू किया था। शहर से एकत्र होने वाले कूड़े-कचरे को भौंती स्थित एटूजेड प्लांट में ले जाकर जैविक खाद, इंटरलाकिंग टाइल्स और बिजली बनाना शुरू किया।
हालांकि 15 मेगावाट क्षमता वाला पावर प्लांट किसी भी हफ्ते पूरी क्षमता से नहीं चल पाया। जितने की बिजली बिक रही थी, उससे ज्यादा लागत कूड़े से कच्चा माल तैयार करने में आ रही थी। समुचित प्रबंधन न होने से तीन साल पहले बिजली संयंत्र को बंद किया गया।
उसकेे छह महीने बाद टाइल्स प्लांट भी बंद हो गया और छह महीने पहले कूड़े से खाद बनाने के प्लांट में भी ताला लग गया। फिर एटूजेड ने जोन-एक, दो और तीन से कूड़ा उठाना भी बंद कर दिया। तब से यह कंपनी सिर्फ जोन-चार, पांच और छह में ही कूड़ा कलेक्ट कर रही थी और उसे प्लांट तक ले जाकर डंप कर रही थी।
शेष तीन जोनों से नगर निगम स्वास्थ्य विभाग कूड़ा डंप कर इसी प्लांट तक पहुंचा रहा है। प्लांट में तैनात कर्मचारियों को पांच महीने से पगार नहीं मिली है।
एटूजेड के सीएनटी मैनेजर दिनेश कटियार ने बताया कि एटूजेड सरेंडर कर चुका है। चूंकि इस प्लांट की मुख्य फाइनेंसर कंपनी आईएलएफएस है, इसलिए एटूजेड और आईएलएफएस में तय हुआ है कि कंपनी एटूजेड ही रहेगी, पर डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन से लेकर प्लांट को चलाने का काम आईएलएफएस करेगी।
एटूजेड अपना पावर प्लांट इस कंपनी को दे चुका है। अब फील्ड वर्क (डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन, वहां से कूड़ा प्लांट तक पहुंचाने) कूड़े से खाद, टाइल्स बनाने का काम इस कंपनी को दिया जाना है।
इसके लिए दोनों कंपनियों में निगोशिएशन चल रहा है। 5, 6 और 7 नवंबर को आईएलएफएस की टीम ने यहां आकर एटूजेड प्लांट का सर्वे किया था। टाटा और अशोक लीलैंड कंपनी के इंजीनियरों को बुलाकर चालू और खराब खड़ी गाड़ियों का सर्वे भी कराया गया था।
वाहनों और प्लांट को ठीक कराकर पूरी क्षमता से चलाने में 20 करोड़ रुपये की जरूरत है। इसके लिए लोन मिलते ही आईएलएफएस कामकाज शुरू कर देगी। कंपनी मौजूदा कर्मचारियों को हटाकर अपने स्तर से भर्तियां करेगी।