शिक्षा विभाग पर हर साल चार हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं, इसके बाद भी शिक्षा गुणवत्ता पटरी पर नहीं आ पा रही है, यह हाल तब है जबकि मुख्यमंत्री खुद इस पर कई बार चिंता जा चुके हैं, लेकिन स्थिति सुधरे भी कैसे?
शिक्षा में सुधार के लिए शोध, टीचरों के प्रशिक्षण और पाठ्य पुस्तकों की समीक्षा के काम का जिम्मा जिस परिषद के पास है, उसका न तो ढांचा लागू हुआ न ही उसे अपना भवन मिल पाया है। वही परिषद को अब शिक्षक चयन प्रक्रिया और छात्रवृत्ति परीक्षाओं का काम सौंप दिया गया है।
प्रदेश में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद का वर्ष 2002 में गठन किया गया। जून 2013 में रातों रात परिषद के कार्यालय को नरेंद्रनगर टिहरी से देहरादून लाया गया, लेकिन पिछले तीन साल बाद भी परिषद के पास अपना भवन नहीं हैं, परिषद का दफ्तर राजीव गांधी नवोदय विद्यालय के कुछ कमरों में चल रहा है।
परिषद का ढांचा अब तक नहीं लागू
परिषद का ढांचा भी अब तक लागू नहीं हो पाया है। वही परिषद से शिवानंद नौटियाल छात्रवृत्ति परीक्षा, निर्धन मैधावी छात्रवृत्ति परीक्षा एवं राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा आदि परीक्षाओं के अलावा अब बीएड टीईटी पास प्रशिक्षित बेरोजगारों के चयन का काम भी सौंप दिया गया है।
परिषद से शिक्षा गुणवत्ता में सुधार संबंधी कार्य के बजाए अन्य कार्य लिए जाने पर देश भर में शिक्षा की समीक्षा करने वाली समिति ज्वाइंट रिव्यू मिशन ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एससीईआरटी में टीचरों की योग्यता, सेवारत एवं सेवा से पूर्व प्रशिक्षण एवं शैक्षिक अनुसंधान का काम होना चाहिए। जिसे छात्रवृत्ति परीक्षाएं एवं डाटा मैनेजमेंट के काम से मुक्त रखा जाना चाहिए।
इनका है कहना
नरेंद्रनगर में परिषद का अपना कार्यालय था, लेकिन बगैर किसी आपदा के रातों रात कार्यालय को दून लाया गया, जिसे आज तक अपना भवन नहीं मिल पाया है, वही परिषद को अन्य कार्य सौंपकर उसे राह से भटकाया जा रहा है।
-गुरुप्रसाद रणाकोटी, अध्यक्ष शिक्षक संघ एससीईआरटी