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जिस पाठ्यक्रम को UP ने ठुकराया, उसे ढो रहा है उत्तराखंड

Mon, 04 Jan 2016 04:27 PM IST
हेमवती नंदन भट्ट/ अमर उजाला, ऋषिकेश
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द्वितीय राजभाषा दर्जा प्राप्त उत्तराखंड में संस्कृत भाषा विभाग अब तक माध्यमिक स्तर प्रथमा से उत्तर मध्यमा द्वितीय वर्ष (कक्षा छह से 12) तक अपना स्लेबस (पाठ्यक्रम) ही नहीं बना पाया है।
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स्थिति यह है कि राज्य बनने के डेढ़ दशक के बाद भी यहां उत्तर प्रदेश की पुरानी शिक्षा प्रणाली पर संस्कृत शिक्षा का दारोमदार टिका है। खास बात यह है कि यूपी के जिस पाठ्यक्रम को उत्तराखंड अब तक ढो रहा है, उसे वहां की राज्य सरकार कई साल पहले समाप्त कर चुकी है।

उक्त पाठ्यक्रम अब कहीं भी उपलब्ध नहीं है। लिहाजा बच्चे फोटो स्टेट की प्रतियों से संस्कृत की शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। इससे राज्य भर में लगभग 49 संस्कृत विद्यालयों के हजारों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
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राज्य का संस्कृत महकमा अयोग्य लोगों की जमात बनकर रह गया है। आलम यह है कि संस्कृतज्ञों और विद्वानों की भरमार वाले राज्य में सरकार और संस्कृत विभाग अब तक अपना माध्यमिक स्तर का पाठ्यक्रम ही तैयार नहीं कर पाया है।

विभाग 2010 में माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद के गठन के बाद से ही इस दिशा में कवायद का दावा कर रहा है। लेकिन अफसोस पांच साल बाद भी पाठ्यक्रम लागू करने की बात तो दूर, उसे तैयार तक नहीं किया जा सका। ऐसी स्थिति में बच्चे अविभाजित उत्तरप्रदेश के समय से चला आ रहा पुराना पाठ्यक्रम पढ़ने को मजबूर हैं।

खास बात यह है कि जो पाठ्यक्रम यहां चल भी रहा है, वह बाजार में कहीं उपलब्ध नहीं है। ऐसे में माध्यमिक स्तर के हजारों बच्चे फोटो स्टेट की प्रतियों से अपना भविष्य संवारने में जुटे हैं।

यह आलम तब है जबकि, राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हैरत की बात यह है कि देववाणी को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने की जल्दबाजी तो की गई, लेकिन उसके बुनियादी ढांचे को तैयार करने की कोई जहमत नहीं उठाई गई। ऐसे में सरकार का यह निर्णय संस्कृत के साथ ही उससे जुड़े लोगों से छद्म मात्र बनकर रह गया है।
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इन पुस्तकों का फोटोस्टेट भी नसीब नहीं

राज्य में संचालित माध्यमिक स्तर पर संस्कृत स्लेबस में कई पुस्तकें ऐसी भी हैं जिनकी फोटोस्टेट प्रति भी उपलब्ध नहीं है। मसलन 18 अनिवार्य विषयों में ऋग्वेद, कृष्ण यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के साथ ही ऐच्छिक विषयों में नेपाली, गृह विज्ञान, थेरवाद, पाली आदि विषयों का पाठ्यक्रम तो दूर, इनकी छाया प्रति भी बच्चों को नसीब नहीं हो पाती।

ऐसे में शिक्षकों को इन विषयों को पढ़ाने में तो दिक्कत आती ही है, साथ ही बच्चों को भी यह विषय औपचारिकता बस लेने पड़ते हैं और बिना पढ़े इनकी परीक्षा देनी पड़ती है। ऐसे में भला उक्त विषयों के बारे में बच्चे किस तरह से जानकारी प्राप्त कर पाते होंगे यह समझा जा सकता है।

गुरुजी और वरिष्ठ छात्रों से लेनी पड़ती है प्रतियां
राज्य में माध्यमिक संस्कृत का पाठ्यक्रम नहीं है। जिन छाया प्रतियों से जैसे तैसे संस्कृत शिक्षा आगे बढ़ रही है उन्हें भी छात्रों को अपने वरिष्ठ छात्रों और शिक्षकों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। उनके पास मौजूद फोटोस्टेट प्रति की कॉपी बनाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसके बाद बच्चे जैसे तैसे इनसे शिक्षा ग्रहण करते हैं।

पाठ्यक्रम को लेकर 19 जनवरी को निदेशक की अध्यक्षता में बैठक प्रस्तावित है। उसमें इस विषय पर विस्तृत चर्चा होगी। वास्तव में पाठ्यक्रम बनाने में काफी विलंब हो चुका है।
- राजेंद्र कुमार बहुगुणा, उप सचिव, संस्कृत शिक्षा निदेशालय
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