द्वितीय राजभाषा दर्जा प्राप्त उत्तराखंड में संस्कृत भाषा विभाग अब तक माध्यमिक स्तर प्रथमा से उत्तर मध्यमा द्वितीय वर्ष (कक्षा छह से 12) तक अपना स्लेबस (पाठ्यक्रम) ही नहीं बना पाया है।
स्थिति यह है कि राज्य बनने के डेढ़ दशक के बाद भी यहां उत्तर प्रदेश की पुरानी शिक्षा प्रणाली पर संस्कृत शिक्षा का दारोमदार टिका है। खास बात यह है कि यूपी के जिस पाठ्यक्रम को उत्तराखंड अब तक ढो रहा है, उसे वहां की राज्य सरकार कई साल पहले समाप्त कर चुकी है।
उक्त पाठ्यक्रम अब कहीं भी उपलब्ध नहीं है। लिहाजा बच्चे फोटो स्टेट की प्रतियों से संस्कृत की शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। इससे राज्य भर में लगभग 49 संस्कृत विद्यालयों के हजारों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
राज्य का संस्कृत महकमा अयोग्य लोगों की जमात बनकर रह गया है। आलम यह है कि संस्कृतज्ञों और विद्वानों की भरमार वाले राज्य में सरकार और संस्कृत विभाग अब तक अपना माध्यमिक स्तर का पाठ्यक्रम ही तैयार नहीं कर पाया है।
विभाग 2010 में माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद के गठन के बाद से ही इस दिशा में कवायद का दावा कर रहा है। लेकिन अफसोस पांच साल बाद भी पाठ्यक्रम लागू करने की बात तो दूर, उसे तैयार तक नहीं किया जा सका। ऐसी स्थिति में बच्चे अविभाजित उत्तरप्रदेश के समय से चला आ रहा पुराना पाठ्यक्रम पढ़ने को मजबूर हैं।
खास बात यह है कि जो पाठ्यक्रम यहां चल भी रहा है, वह बाजार में कहीं उपलब्ध नहीं है। ऐसे में माध्यमिक स्तर के हजारों बच्चे फोटो स्टेट की प्रतियों से अपना भविष्य संवारने में जुटे हैं।
यह आलम तब है जबकि, राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हैरत की बात यह है कि देववाणी को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने की जल्दबाजी तो की गई, लेकिन उसके बुनियादी ढांचे को तैयार करने की कोई जहमत नहीं उठाई गई। ऐसे में सरकार का यह निर्णय संस्कृत के साथ ही उससे जुड़े लोगों से छद्म मात्र बनकर रह गया है।