स्वामी विवेकानंद लॉ कॉलेज में निर्धारित सीटों से ज्यादा दाखिले लेने पर कॉलेज के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई। शुक्रवार को लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक में इस कॉलेज की मान्यता (संबद्धता) खत्म करने का निर्णय लिया गया।
यही नहीं, इस कॉलेज पर 15 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह रकम कॉलेज ने सीटों की निर्धारित संख्या से अधिक जितने भी स्टूडेंट का दाखिला लिया है, वह धनराशि है।
अब यह रकम कॉलेज व यूनिवर्सिटी को जमा करनी होगी। इस कॉलेज को एलएलबी त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम में कुल 120 सीटें आवंटित हैं और इसने अपने यहां 300 स्टूडेंट्स को प्रवेश दे दिया।
यानी प्रथम सेमेस्टर में 180 स्टूडेंट के अधिक दाखिले ले लिए थे। मामला सामने आते ही यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इनका रिजल्ट रोक दिया था।
कार्यपरिषद ने इन 180 स्टूडेंट का रिजल्ट घोषित कर इन्हें किसी अन्य कॉलेज में समायोजित करने का निर्णय लिया है। बाकी जो कॉलेज को सीटें आवंटित हैं और उनमें सभी सेमेस्टरों में जो स्टूडेंट पढ़ रहे हैं।
वह इसी कॉलेज में ही अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे। इनका कोई नुकसान नहीं होगा। कार्यपरिषद ने नए सत्र 2014-15 से कॉलेज में दाखिले पर रोक लगा दिया है।
मान्यता वापसी की कार्रवाई जल्द से जल्द शुरू करने के निर्देश यूनिवर्सिटी प्रशासन को दिए हैं। शुक्रवार को कार्यपरिषद की बैठक शुरू होते ही स्वामी विवेकानंद लॉ कॉलेज के फर्जीवाड़े पर प्रति कुलपति प्रो. एके सेन गुप्ता कमेटी की जांच रिपोर्ट पर चर्चा शुरू हो गई।
कार्यपरिषद की बैठक में सदस्यों ने दो टूक कहा कि अगर कॉलेज इसी तरह अपनी मनमानी करेंगे और उन पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी तो वह पूरी तरह बेलगाम हो जाएंगे।
ऐसे में इस कॉलेज की मान्यता वापसी के साथ-साथ इससे जुर्माना भी वसूला जाए। कार्यपरिषद ने 10 हजार रुपये प्रति स्टूडेंट फीस मानते हुए 180 स्टूडेंट्स की फीस वसूलने को कहा।
यह राशि कुल 18 लाख रुपये लगभग थी लेकिन बाद में कार्यपरिषद सदस्यों ने कहा कि 15 लाख रुपये जुर्माना व मान्यता वापसी के आदेश जारी करने के निर्देश दे दिए।
वहीं, कार्यपरिषद की मीटिंग की वीडियोग्राफी का मुद्दा भी बैठक में रखा गया। इसे कार्यपरिषद के सदस्यों ने एक स्वर में खारिज कर दिया।
कार्यपरिषद के सदस्यों ने कहा कि यह कोई राजनीतिक पार्टी की बैठक नहीं है, जिसमें विपक्ष व सत्तापक्ष हो। यहां जो निर्णय लिया जाता है वह छात्रहित में होता है और उसे लागू किया जाता है।
ऐसे में बैठक की वीडियोग्राफी करवाने का कोई मतलब नहीं है। मालूम हो कि बीते वर्षों में एक-दो बार कार्यपरिषद के सदस्यों ने ही बैठक में पास हुए मीट्सि को मैन्युपुलेट कर दूसरा आदेश निकालने पर आपत्ति जताई थी।
पूर्व कुलपति प्रो. मनोज कुमार मिश्रा के कार्यकाल में एक दो बार यह मुद्दा उठा था। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी वीडियोग्राफी करवाने का मसौदा तैयार किया था लेकिन इसे कार्यपरिषद ने वापस कर दिया।
एलयू की कार्यपरिषद की बैठक में करीब नौ कॉलेजों को कोर्स चलाने की अस्थायी व स्थायी संबद्धता के प्रकरण भी रखे गए लेकिन इसे अगली बैठक के लिए टाल दिया है।
सूत्रों की मानें तो इन कॉलेजों में से एक कॉलेज ऐसा था जिसके जमीन से जुड़े कागजों को लेकर ऊहापोह की स्थिति थी। ऐसे में इसे आगे के लिए टाल दिया गया।
बैठक में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से एमफिल, पीएचडी के लिए विनियम 2009 के अनुपालन में पीएचडी अध्यादेश के मॉडल ड्राफ्ट को उप्र विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के आधार पर क्रियान्वित करने को कार्य परिषद ने मंजूरी दे दी है।