आपके आसपास क्षेत्र में सरकारी स्कूल होने के बावजूद इस साल गरीब बच्चों को निजी स्कूल में मुफ्त दाखिला मिल सकेगा। शर्त यह होगी कि पड़ोस के सरकारी स्कूल की कक्षा में 40 बच्चों के दाखिले हो चुके हों। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत जारी शासनादेश में इस साल यह प्रावधान किया गया है।
आरटीई के लिए पहले जारी हुए शासनादेश में सरकारी स्कूल की सीटें फुल होने के बाद निजी स्कूल में दाखिला देने का प्रावधान था लेकिन एक कक्षा में अधिकतम संख्या तय न होने की वजह से शिक्षा अधिकारी निजी स्कूल में दाखिले को पूरी तरह से नकार देते थे।
अब एक कक्षा में 40 बच्चों की संख्या तय होने के कारण पड़ोस में सरकारी स्कूल होने के बावजूद गरीब बच्चे के पास निजी स्कूल में दाखिले का मौका होगा।
स्कूल उड़ा रहे हैं नियमों की धज्जियां
शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 में स्पष्ट प्रावधान है कि सभी स्कूलों को उनके यहां आठवीं तक हर कक्षा में 25 फीसदी सीटों पर गरीब बच्चों को निशुल्क दाखिला देना है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यह प्रावधान अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं है।
गरीब बच्चों की फीस की प्रतिपूर्ति राज्य सरकार को करनी है। वर्ष 2012 में जैसे-तैसे गरीब बच्चों के मुफ्त दाखिले के लिए शासनादेश जारी किया गया। शासनादेश में आरटीई की मंशा के विपरीत सभी स्कूलों के बजाय केवल शहरी क्षेत्र के उन वार्ड के गरीब बच्चों को निजी स्कूल में दाखिला देने की व्यवस्था की गई जहां सरकारी स्कूल नहीं है।
यहां भी अभिभावकों को जिला अधिकारी से एडमिशन की अनुमति लेनी पड़ती है। नतीजा यह हुआ कि गरीब अभिभावक कागजी खानापूर्ति में लगे रहे और लखनऊ में केवल चार बच्चों को निजी स्कूल में दाखिला मिल सका।
गरीब भी निजी स्कूल में कर सकेंगे पढ़ाई
शासनादेश में सरकारी स्कूल की सीटें भरने के बाद निजी स्कूल में दाखिले की बात कही गई लेकिन एक कक्षा में दाखिले की अधिकतम संख्या तय न होने के कारण निजी स्कूल में दाखिला मिलना संभव नहीं हो पा रहा था।
शिक्षा निदेशक दिनेश बाबू शर्मा द्वारा छह जनवरी को जारी शासनादेश के अनुसार सरकारी स्कूल की एक कक्षा में 40 एडमिशन होने के बाद गरीब बच्चे को निजी स्कूल में दाखिला दिलाना अनिवार्य किया गया है। इसके बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि निजी स्कूलों में गरीबों के बच्चे पढ़ाई कर सकेंगे।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 के अनुसार सभी स्कूलों को उनके यहां की कम से कम 25 फीसदी सीटों पर गरीब बच्चों को छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देनी है।प्रदेश सरकार ने अधिनियम की मंशा के विपरीत जाकर केवल शहरी क्षेत्र के निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को दाखिला देने संबंधी शासनादेश किया। शासनादेश के अनुसार निजी स्कूलों में गरीब बच्चे के दाखिले के लिए बेसिक शिक्षा अधिकारी के पास आवेदन करना होगा।
इस तरह कर सकेंगे आवेदन
आवेदन के साथ आय प्रमाण और निवास का प्रमाणपत्र लगाना होता है। बीएसए संतुष्ट हुए तो फिर आवेदन को जिलाधिकारी के यहां भेजा जाएगा। जिलाधिकारी के बाद ही बच्चे को निजी स्कूल में दाखिला मिल सकता था।
झुग्गी-झोपड़ी और गरीबी में जीवन काटने वाले व्यक्ति के लिए पहले तो आय और निवास प्रमाणपत्र बनवाना काफी कठिन काम है। इसके बाद रोजी-रोटी की फिक्र छोड़कर जिला बेसिक शिक्षा कार्यालय और डीएम कार्यालय के चक्कर काटना किसी दिहाड़ी मजदूर के लिए मुमकिन नहीं है।
नतीजा यह है कि राजधानी में भी निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को दाखिला नहीं मिल पा रहा है।जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीण मणि त्रिपाठी ने बताया कि अधिनियम के लिए जारी नए शासनादेश के हिसाब से गरीब बच्चों के निशुल्क दाखिले की कार्यवाही शुरू हो गई है।
आवेदन आमंत्रित करने के लिए प्रचार-प्रसार किया जाएगा। कोशिश की जाएगी कि इस साल ज्यादा से ज्यादा बच्चों को निजी स्कूल में मुफ्त दाखिला दिलाया जा सके।