जिंदगी में अगर कुछ छोटा या बड़ा होता है तो वह है व्यक्ति का नजरिया।
कुछ ऐसा ही संदेश दिया लखनऊ यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन में शनिवार को हुए फिल्म फेस्टिवल विबग्योर में दिखाई गई लघु फिल्मों ने।
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फेस्टिवल के दौरान एमजेएमसी थर्ड सेमेस्टर के स्टूडेंट्स द्वारा बनाई गई 12 फिल्मों के साथ ही विभाग के कोऑर्डिनेटर डॉ. मुकुल श्रीवास्तव को डेडीकेट की गई एक खास शॉर्ट फिल्म भी दिखाई गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एसबी निम्से ने की। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्टूडेंट्स द्वारा बनाई गई फिल्मों की सीडी का विमोचन किया।
बड़े काम का लंच बॉक्स
शिवानी, देवेंद्र और विकास ने फिल्म ‘लंच बॉक्स’ के माध्यम से बताया कि स्टूडेंट लाइफ में लंच बॉक्स भूख मिटाने के साथ रिश्ते बनाने में काम आता है।
अंकिता और कोमल की फिल्म ‘वॉटर बॉटल’ में दिखाया कि एक बॉटल किस तरह पूरी क्लास में घूमने के साथ खेलने के काम आती है।
नशरा, नीरज, नितीश और स्मृति ने ‘वेस्टेज ऑफ फूड’ में दिखाया कि लोग पार्टियों में, घर में खाना बरबाद करते हैं। जबकि देश में एक बड़ी आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती है।
स्माइलीज से नहीं बयां हो सकती इंसानी भावनाएं
फिल्म ‘उपहारों के रंग’ में दिखाया कि कोई भी गिफ्ट छोटा या बड़ा नहीं होता। नीलाक्ष और श्वेता की फिल्म ‘बैगवती’ में बहुत खूबसूरती से दिखाया गया कि हैंड बैग सिर्फ सामान रखने के नहीं बल्कि फैशन और मस्ती के काम भी आता है।
फिल्म ‘आखिर मैं ही क्यूं ?’ में महिलाओं की व्यथा और उन पर हो रहे अत्याचार को दिखाया गया। फिल्म ‘अंदाज ए बयां’ के माध्यम से सभी लोगों के विभिन्न खास अंदाज को दिखाया गया।
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