इनफेक्शन से चार साल की उम्र में ही आंखों की रोशनी चली गई। परिवार के पास भी पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे, मगर उसने मन में ठान लिया था कि वह अपने मुकाम को हासिल करके ही दम लेगा। पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले इस होनहार स्टूडेंट का नाम है सुखबीर सिंह।
पीयू सोशियोलॉजी विभाग में पीएचडी स्कॉलर सुखबीर पीएचडी में दाखिला पाने वाले पहले दृष्टिहीन स्टूडेंट हैं। बरेली में जन्मे 31 वर्षीय सुखबीर ने जिंदगी के हर कठिन दौर को हंसते हुए जीया। सुखबीर ने कहा कि आंखों की रोशनी जाने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती। बुरे हालातों ने ही उन्हें जिंदगी जीने का सही रास्ता दिखाया।
नेट क्लीयर अब पीएचडी पर फोकस
सुखबीर ने चंडीगढ़ के सेक्टर-26 स्थित ब्लाइंड इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया। दसवीं से एमए तक सुखबीर ने हमेशा प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास की। बीएड, एमए सोशियोलॉजी के बाद उसने 2011 में नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) भी क्लीयर कर दिया।
सुखबीर ने कहा कि उनका लक्ष्य सिर्फ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर या आईएएस बनना है। 2012 में सुखबीर सिविल सर्विसेज एग्जाम में पहले ही चांस में प्रारंभिक परीक्षा पास कर चुके हैं। सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए जरूरी संसाधन न होने के कारण सुखबीर का आईएएस बनने का सपना अधूरा रह गया।
मगर उसने हार नहीं मानी और अब वह मई 2015 में फिर से सिविल सर्विसेज तैयारी में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया कि पिता लोचन सिंह और मां गंगा देवी खेती कर परिवार का खर्च निकालते हैं।
बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर निकाल रहे खुद का खर्च
सुखबीर के पास कोई खास आर्थिक मदद नहीं है, लेकिन बीए करते हुए ही उन्होंने स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। ट्यूशन के पैसे से ही कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का खर्च निकाला।
अभी भी वह मलोया में स्कूली बच्चों को ट्यूशन देते हैं। सोशियोलॉजी विभाग में प्रो. किरणप्रीत कौर की देखरेख में पीएचडी कर रहे सुखबीर ने कहा कि टीचर्स और दोस्तों के सहयोग से वह जल्द पीएचडी की डिग्री भी हासिल करेंगे।