केवल पंजाब ही नहीं बल्कि, पूरे देश में उच्च शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने के लिए प्राइमरी स्तर से प्रयास करने होंगे।
राजनीतिक हस्तक्षेप और पूरा फंड न मिलने के कारण भारत शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है।
शिक्षा में निजीकरण पर बेवजह हल्ला नहीं करना चाहिए। प्राइवेट कंपनियों को भी उच्च शिक्षा स्तर पर शिक्षा में भागीदार बनना चाहिए।
पंजाब यूनिवर्सिटी में शनिवार को ‘हायर एजूकेशन इन पंजाब-अचीवमेंट एंड चैलेंजिज’ विषय पर आयोजित पैनल डिस्कशन में यह बात सामने आई। इसमें नॉर्थ रीजन की विभिन्न यूनिवर्सिटियों के कुलपतियों और शिक्षाविदों ने अपने विचार रखे।
पीयू में प्रो. रुचि राम साहनी के 150वें जन्मदिवस पर तीन दिवसीय एकेडमिक कार्यक्रम का शनिवार को समापन हो गया। कार्यक्रम में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के वीसी प्रो. जयरुप सिंह, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के वीसी प्रो. जसपाल सिंह, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के वीसी डॉ. डीडीएस संधू (रिटायर्ड ले. जनरल) और इंटरनेशनल सेंटर फॉर ह्यूमन डेवलेपमेंट के अंतरिम डायरेक्टर प्रो. पीटर रोनाल्ड डिसूजा और पीयू के वीसी प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर ने शिरकत की।
पैनल डिस्कशन में वक्ताओं ने पंजाब में 150 साल में उच्च शिक्षा में आए बदलाव और भविष्य की योजनाओं पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. स्वर्णजीत कौर और प्रो. नंदिता सिंह की देखरेख में हुआ।
ग्रामीण स्तर पर उच्च शिक्षा का स्तर नीचे
कई शिक्षाविदों ने पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र में उच्च शिक्षा के पिछड़ेपन की आवाज उठाई। पंजाब के विधायक महेश इंद्र सिंह ने कहा कि करीब छह साल पहले 16 एकड़ जमीन और एक करोड़ राशि देने पर भी पीयू का रीजनल सेंटर नहीं बन पाया।
पीयू सीनेटर डॉ. एसएस सांघा ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए पीयू के सभी कोर्सों में 2-3 सीट रिजर्व होनी चाहिए। इसमें प्रो. रौनकी राम, प्रो. मनजीत सिंह, डॉ. हरीश शर्मा और डॉ. जगवंत सिंह ने भी अपने विचार रखे।
पीयू ने नकारे दुनिया ने किया सलाम
पीयू के पूर्व वीसी और सीनेटर प्रो. आरपी भांभा ने शिक्षा प्रणाली में दोष पर दिल की बात कह दी। उन्होंने कहा कि पंजाब यूनिवर्सिटी के एलमनाई डॉ. मनमोहन सिंह और प्रो. हरगोबिंद सिंह खुराना को पीयू की राजनीति के कारण सम्मान नहीं मिला।
बाद में इन्हीं लोगों ने दुनिया में पंजाब यूनिवर्सिटी का नाम रोशन किया है। डॉ. मनमोहन सिंह और हरगोबिंद खुराना की नियुक्ति पर पीयू सीनेट और सिंडीकेट में राजनीति के कारण सहमति नहीं बन पाई थी। हरगोबिंद खुराना को बाद में नोबेल पुरस्कार मिला और डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने।