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शिक्षण संस्थानों में हस्तक्षेप से बाज आए नेता: नवाज

Wed, 17 Feb 2016 09:08 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला देहरादून
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दून पहुंचे शायर नवाज देवबंदी ने देश का माहौल खराब करने वालों को शायराना अंदाज में घेरा। उन्होंने न केवल अवार्ड लौटाने वालों की खिंचाई की बल्कि शिक्षण संस्थानों में माहौल खराब करने वालों पर भी करारी चोट की। उन्होंने कहा कि हमारे जितने भी शिक्षण संस्थान हैं, सभी इबादतगाह हैं।
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हमारे नेताओं को वहां हस्तक्षेप से बाज आना चाहिए। कहा कि जो लोग सियासती सोच के साथ अपने अवार्ड लौटा रहे हैं, वह सरासर गलत है। साहित्यकार का मतलब ईमानदार, निष्ठावान होता है। ऐसे में एक सच्चा साहित्यकार कैसे सियासत का हिस्सा बन सकता है। साहित्य हर हैवान को इंसान बना देता है। साहित्य का एक-एक शब्द, एक-एक पंक्ति शैतानों के पैरों में जंजीर डाल देती है।

उन्होंने शिक्षण संस्थानों में साहित्य को बढ़ावा देने की हिमायत करते हुए कहा कि साहित्य बड़े बड़े हैवानों को भी इंसान बना देता है। इसका एक एक लफ्ज पैरों में जंजीर डाल देता है। जेएनयू प्रकरण के मामले पर उन्होंने कहा कि मामले की जांच होनी चाहिए। तह तक तहकीकात के बाद जो दोषी हों, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
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ऐसा साहित्य परोसे कि दुश्मन भी दोस्त बन जाएं-
नवाज देवबंदी ने कहा कि आज के टूटते समाज में साहित्यकारों की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है। उन्हें चाहिए कि वह ऐसा साहित्य परोसें, जिससे दो दुश्मन भी दोस्त बन जाएं। दूरियां खत्म हो जाएं और सभी प्यार से एकता व भाईचारे से एक साथ रहें। समाज को भी ऐसे बेईमान लोगों का बहिष्कार करना चाहिए।

एक मंच पर हो कविता और शायरी
आज भले ही कविता और शायरी को मजहबी रंग देने वालों की कमी नहीं है लेकिन नवाज देवबंदी के हिसाब से कविता और शायरी एक ही मंच पर होनी चाहिए। जिस दिन दोनों एक साथ होंगी, उसी दिन हम असल हिंदुस्तान देखेंगे।

बच्चों, युवाओं में जगा रहे शायरी का शौक
नवाज देवबंदी खुद बच्चों और युवाओं को साहित्य से जोड़ने का काम कर रहे हैं। इसके लिए वह स्कूलों में 25 बच्चों का मुशायरा कराते हैं, जिसमें मंच पर बच्चे बड़े-बडे़ शायरों के कलाम पेश करते हैं। इसी प्रकार, विश्वविद्यालयों में साल में एक बार कवि सम्मेलन का आयोजन कराते हैं, जिसमें दूसरे मजहबों के युवा शामिल होकर शायरी करते हैं।
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नवाज का शायराना लहजा-
रोशनी का कुछ न कुछ इमकान होना चाहिए,
बंद कमरे में भी रोशनदान होना चाहिए।
वो जो अनपढ़ हैं तो चलो हैवान हैं तो ठीक है,
हम पढ़े लिखों को तो इंसान होना चाहिए।
हिंदू, मुस्लिम चाहे जो लिखा हो माथे पर मगर,
आप के सीने पे हिंदुस्तान होना चाहिए।
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